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मैंथा की खेती की ओर फिर से किसानों ने किया रूख

Meerut Bureauमेरठ ब्यूरो Updated Mon, 27 May 2019 12:39 AM IST
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मैंथा की खेती की ओर फिर से किसानों ने किया रुख
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बिजनौर। मैंथा किसानों के फिर से दिन बहुरने वाले हैं। मैंथा की खेती करने वाले किसानों को अब तेल के अच्छे दाम मिलने लगे है। पिछले कुछ साल में फसल के सही दाम न मिलने से मैंथा की खेती से किसानों ने मुंह मोड़ लिया था।
क्षेत्र में करीब 20 वर्ष पूर्व संभल से आए कुछ व्यापारियों ने ठेके पर जमीन लेकर मैंथा की खेती बड़े पैमान पर प्रारंभ की थी। इन्हें देख क्षेत्र के किसानों ने भी इस फसल को उगाना शुरू कर दिया। किसानों का कहना है कि उस समय दो से तीन हजार लीटर तक मैंथा तेल का भाव था। अच्छे मुनाफे को देख क्षेत्र के तमाम किसानों ने मैंथा की खेती करनी शुरू कर दी। इसके चलते दर्जनों किसानों ने सन 2000 के आसपास मैंथा तेल निकालने के लिए प्लांट लगाए। कुछ वर्षों के बाद ही मैंथा तेल के भाव गिरते चले गए। पहले इसका मूल्य दो से तीन हजार रुपये लीटर था। अब यह 200 से 300 रुपये लीटर तक आ गए। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ा। किसानों का कहना है कि लेवर खर्च, तेल पानी का खर्च भी न निकल पाने के कारण किसानों का रुझान मैंथा की खेती से हटता चला गया। धीरे-धीरे मैंथा की खेती चौपट होती चली गई।

कबाडे़ में बेचने पडे़ कीमती प्लांट
किसानों का कहना है कि तेल निकलवाने के लिए उन्हें 20 से 30 किलोमीटर तक ट्रैक्टर ट्रॉलियों में मैंथा लादकर जाना पड़ता था। तेल को बेचने अमरोहा मंडी तक ले जाने में बड़ी परेशानी उठानी पड़ती थी। वहां भी उचित दाम नहीं मिलने से किसान की माली हालत खस्ता होती चली गई। किसानों ने यह खेती बंद की तो प्लांट लगाने वाले किसानों ने लाखों में लगने वाले प्लांटों को कबाड़ के भाव बेच डाला। इस कारण क्षेत्र में मात्र चार प्लांट बचे हैं। जो खत्म होनेके कगार पर हैं। किसानों ने बताया कि ठेके पर जमीन लेकर मैंथा उगाने वालों को दो लीटर तेल प्रति बीघा जमींदार को देना पड़ता था। मैंथा तेल निकालने पर आने वाली तीव्र गंध के कारण लेबर न मिलना एक गंभीर समस्या है। किसानों ने बताया कि उनके क्षेत्र की भूमि नम प्रवृति की होने से खेत वर्षा होने पर बारिश का पानी जल्द नहीं सोख पाते हैं। जिससे मैंथा का पौधा गल जाता है और तेल जमीन में चला जाता है। इससे खासा नुकसान किसान को होता है।

पांच से पचास एकड़ तक पहुंचा क्षेत्रफल
काफी वर्ष के बाद गत वर्ष मैंथा तेल के भाव कुछ ठीक आए तो किसानों ने फिर इस ओर रुख करना प्रारंभ कर दिया है। जिसके चलते पिछले वर्ष क्षेत्र में दस पांच एकड़ मैंथा की खेती की गई। इस वर्ष बढ़कर 50 एकड़ तक पहुंच गई है। किसानों का कहना है दाम सही मिले तो फिर से क्षेत्र में किसान बड़े स्तर पर मैंथा की खेती करेंगे। क्षेत्र के किसान लक्ष्मण सिंह का कहना है कि उन्होंने 2002 में तेल निकालने का प्लांट भी लगाया। मैंथा की खेती भी की, किंतु तेल के खरीदार और सही दाम न मिलने से उन्होंने खेती छोड़ दी। इसी गांव के किसान होशियार सिंह ने बताया कि उन्होंने इस वर्ष मैंथा तेल के दाम ठीक आने से करीब छह बीघा मैंथा बोया है। हरजीत सिंह ने बताया कि अब से तीन वर्ष पूर्व मैंथा बोना छोड़ दिया। बताया कि थोड़ी वर्षा से भी मैंथा की खेती को नुकसान हो जाता है, क्योंकि हमारे यहां की जमीन जल्द पानी नहीं सोखती है। गांव के किसान पवन कुमार ने इस वर्ष फिर से मैंथा की फसल लगाई है, साथ ही आज भी मैंथा प्लांट अपने खेत में लगा रखा है। दाम ठीक मिले तो आगे भी मैंथा बोएंगे।

मैंथा की खेती पर एक नजर
मैंथा की बुवाई-कटाई का समय : फरवरी मार्च में बोकर लगभग जून में तैयार हो जाता है। लगभग 90 दिन की खेती होती है।
मैंथा की बुवाई : एक बीघा की कुल लागत तीन से चार हजार रुपये तक आती है।
मैथा की पैदावार : एक बीघा के खेत की अच्छी फसल में 20 से 25 लीटर तेल निकल जाता है।
मैंथा तेल निकलवाने में लागत 50 से100 रुपये प्रति लीटर तक आती है। मैंथा की अच्छी पैदवार व मुनाफ़ा लेने के लिए मौसम की अनुकूलता जरूरी है। ज्यादा वर्षा की संभावना हो तो मैंथा की खेती को नुकसान हो जाता है। साथ ही फसल काटने के एक दिन पूर्व खेतों में यूरिया खाद डालें ताकी जमीन खुश्क हो जाए और तेल ऊपर पत्तियों में आ जाए। अच्छी फसल लेने के लिए खेतों में दो बार निराई गुड़ाई समय अनुसार कराएं। घास न होने दें। इस तरह किसान मैंथा की फसल से अच्छा लाभ ले सकता है।

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