ऐसे तो ऊसर हो जाएगी अपनी मिट्टी

Basti Updated Sun, 04 Nov 2012 12:00 PM IST
बस्ती। जिले की मिट्टी की सेहत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। लगातार घट रही उर्वरा शक्ति से कृषि वैज्ञानिक घबराए हुए हैं। अंदेशा है कि किसान जागरूक होकर उपाय नहीं किए तो अच्छी खासी मिट्टी ऊसर बन जाएगी। इससे लगातार उत्पादन घटता जाएगा। इसके भयावह परिणाम हो सकते हैं।
अपनी मिट्टी पहचानो अभियान के दो चरणों में लिए गए नमूनों की जो रिपोर्ट आई है, वह चिंताजनक है। उप निदेशक कृषि रक्षा डाक्टर पीके कनौजिया के मुताबिक, अब तक लिए गए 4668 नमूनों की जांच में पाया गया कि नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की कमी पूरे जिले की मिट्टी में है। इसके अलावा सल्फर और जिंक की कमी भी फसलों को कमजोर कर रहे हैं। थोड़ी मात्रा कॉपर की मात्रा भी कम मिली है। प्रति हेक्टेयर मिट्टी में 0.80 फीसदी नाइट्रोजन होना चाहिए। मगर यह घटकर 0.40 तक पहुंच गया है। ऐसे ही फास्फोरस प्रति हेक्टेयर 40 प्रतिशत की जगह 15-20 प्रतिशत रह गया है। इसी तरह पोटाश की मात्रा भी घटकर आधी रह गई है। मिट्टी में बोरान और आयरन की अधिकता पाई गई है। इसी वजह वजह से यहां का पानी खराब हो रहा है। मिट्टी में क्लोरीन और कैल्शियम की कमी भी पाई जा रही है।

इन तत्वों का फसल पर असर
मिट्टी में सूक्ष्म तत्वों की कमी से उत्पादन तो प्रभावित होगा ही साथ ही दाने कमजोर होंगे और उनमें चमक नहीं होगी। उप निदेशक कृषि रक्षा डाक्टर पीके कनौजिया के मुताबिक, नाइट्रोजन की कमी से जडे़ं कमजोर हो जाती हैं। जबकि फास्फेट की कमी से पौधों का विकास रुक जाता है। फसल देर से पकती है और दाने भी छोटे रह जाते हैं। पोटाश की कमी से दाने कमजोर होते हैं। और उनमें आकर्षण नहीं होता। इसलिए बाजार में उसका अच्छा रेट नहीं मिल पाता है। सल्फर की कमी से तिलहनी फसलों में तेल की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

क्यों बेकार होती जा रही मिट्टी
मिट्टी विशेषज्ञों की मानें तो लगातार रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी खराब होती जा रही है। मिट्टी के लाभकारी या मित्र कीट मर जा रहे हैं। इसके अलावा खेत में खर-पतवार जलाने से पूरा का पूरा नाइट्रोजन और सल्फर गायब हो जाता है।

कैसे बचाएं मिट्टी
मिट्टी को ऊसर बनने से बचाने के लिए जैविक खाद के इस्तेमाल पर अधिक जोर देने की जरूरत है। फास्फोरस को रिएक्टिव करने के लिए पीएसबी (फास्फोरस साल्वोलाइजिंग बैक्टीरिया) जिसे फास्फेटिका भी कहते हैं, का इस्तेमाल करना चाहिए। बुआई के समय बीज के साथ प्रति 10 किलोग्राम बीज पर दो सौ ग्राम फास्फेटिका की मात्रा मिला देने से तत्वों की कमी दूर हो जाती है।

विशेषज्ञों की काम की सलाह
: आलू में जिप्सम का इस्तेमाल करने से 10 प्रतिशत उत्पादन बढे़गा
: 75 से 90 फीसदी छूट पर उपलब्ध है जिप्सम
: अधिकतर सूक्ष्म तत्वों को पूरा करेगा जिप्सम
: सीड ड्रिल से बुआई करने पर बडे़गी पैदावार
: बीज के साथ फास्फेटिका का करें इस्तेमाल
: खेत में कभी भी न जलाएं खर-पतवार
: जीवांश यानी गोबर की खाद, मुर्गी की खाद और हरी खाद का प्रयोग करें

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