मंडल में ‘वेंटिलेटर’ पर इलाज की व्यवस्था

Basti Updated Sat, 06 Oct 2012 12:00 PM IST
बस्ती। मंडल में स्वास्थ्य सेवाएं खुद बीमारी की शिकार हैं। मंडल के तीनों जिले में सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकाें की कमी से स्वास्थ्य सुविधा लड़खड़ा रही है। कुछ जगह विशेषज्ञ चिकित्सकों के इंतजार में मशीनें धूल से पट रही हैं। केवल बस्ती जिले में ही 24 लाख आबादी पर महज 135 डॉक्टर्स की तैनाती है। संख्या बल में संतकबीरनगर मामूली समृद्ध है। वहां की 17 लाख की आबादी पर 119 डॉक्टर तैनात हैं। वहीं सिद्धार्थनगर में 188 की जगह बमुश्किल 120 डॉक्टर ही उपलब्ध हैं। मरीजों की बढ़ती तादाद इन मौजूद डॉक्टर्स की भी परेशानी बढ़ा रही है। पूर्वांचल का मिनी पीजीआई कहे जाने वाले ओपेक कैली अस्पताल भी इस मामले में कमजोर साबित हो रहा है। डॉक्टर के इंतजार में वहां बेशकीमती मशीनों को जंग लग रही है।
कौन संभाले जिला अस्पताल का प्रेशर!
बस्ती। जिले की 24 लाख की आबादी पर 135 डॉक्टर तैनात हैं। जिले में कहने को तो 17 सरकारी अस्पताल हैं, लेकिन कमोबेश सब जबह डॉक्टर्स की कमी है। सीएमओ के अधीन जिले में 152 डॉक्टर के पद स्वीकृत हैं, जबकि मात्र 84 तैनात हैं। जिले में सात सीएचसी, 11 पीएचसी और करीब 10 नवसृजित स्वास्थ्य केंद्र स्थापित हैं। लेकिन अधिकांश पर डॉक्टर नदारद है। जिला अस्पताल में 47 डॉक्टर्स के स्वीकृत पद के सापेक्ष महज 21 की तैनाती है। यहां फीजिशियन, कार्डियोलाजिस्ट और न्यूरो विशेषज्ञ की वर्षों से तैनाती नहीं की गई। क्षेत्रीय निदान केंद्र में रेडियोलॉजिस्ट के तीन के सापेक्ष एक भी मौजूद नहीं। सीनियर पैथोलॉजिस्ट का पद पिछले एक साल से रिक्त है। डा. सीपी तिवारी के सेवानिवृत्ति के बाद अब तक शासन ने किसी को तैनात नहीं किया। जबकि पैथोलॉजिस्ट के तीन के सापेक्ष महज एक डाक्टर तैनात हैं। पीडियाट्रिशियन विभाग में तीन के बजाय दो की तैनाती है।
कैली भी बदहाली से वंचित नहीं
ओपेक कैली अस्पताल की स्थापना 1993 में तत्कालीन बसपा सरकार ने कराई थी। इसके बाद सरकार की सूरत बदलते ही यहां की सुविधाओं को कुशीनगर और सैफई स्थानांतरित कर दिया गया। यहां पर 43 की जगह महज 23 चिकित्सक तैनात हैं। 2009 में यहां करीब 54 लाख रुपये की लागत से बने ब्लड सेपरेटर यूनिट को स्थापित तो कर दिया गया था, लेकिन संचालन जनवरी 2012 में शुरू हो सका। जबकि फेको सर्जरी की मशीन महज इस लिए रखी पड़ी है, क्योंकि उसको चलाने वाले विशेषज्ञ को शासन ने तैनात नहीं किया है। सीएमओ डा. एसपी दोहरे का कहना है 53 डॉक्टर्स की तैनाती शासन ने जिले के लिए किया है। इसमें से छह ज्वाइन कर चुके हैं। जल्द ही अन्य डॉक्टर्स के आने के बाद उन्हें अस्पतालों में तैनात किया जाएगा।
राम भरोसे आधी आबादी की सेहत
बस्ती। वीरांगना रानी तलाश कुंवरि जिला महिला चिकित्सालय में जननियों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है। यहां 15 के सापेक्ष सिर्फ तीन लेडी डॉक्टर की स्थायी तैनाती है। जबकि तीन संविदा पर हैं, जिनक ा नवीनीकरण 31 मार्च के बाद तीन माह तक नहीं हो पाया था, लेकिन अगस्त में नवीनीकरण होने के बाद इन्होंने फिर काम करना प्रारंभ किया। अस्पताल में नवजात शिशुओं की जान की हिफाजत करने के लिए एक भी बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं है। प्रसव के समय किसी आकस्मिक की स्थिति में जिला चिकित्सालय की मदद लेनी पड़ती है। नवजातों की देखरेख के लिए बन रहे न्यू सिक बार्न केयर यूनिट की स्थापना का कार्य भी एनआरएचएम घोटाले के कारण अधर में लटका है। सीएमएस डा. सरोजबाला कहती हैं कि हर महीने मासिक प्रगति रिपोर्ट के साथ डॉक्टर और अन्य स्टाफ तैनात करने की मांग की जाती है, लेकिन परिणाम बहुत सकारात्मक नहीं मिल रहा है।
संतकबीरनगर में सुविधाओं का अभाव
17 लाख की आबादी वाले संतकबीरनगर जिले में चार सीएचसी खलीलाबाद, सेमरियावां, मेंहदावल, मलौली (हैंसर), तीन पीएचसी बघौली, सांथा, नागथनगर, के अलावा 18 न्यू पीएचसी संचालित हैं। संयुक्त चिकित्सालय के नाम पर सीएचसी खलीलाबाद में ही पुरुषों और महिलाओं का इलाज किया जाता है। यहां सीएमओ के अधीन स्वीकृत 109 पद के सापेक्ष 119 की तैनाती है। इसमें संयुक्त चिकित्सालय में पुरुष और महिला अस्पताल के 81 के सापेक्ष 78 डॉक्टर्स शामिल हैं। यहां मैनपावर की स्थिति बस्ती से बेहतर है। लेकिन जिला अस्पताल का दर्जा न मिलने तथा आधुनिक संसाधन न होने से न तो कार्डियोलॉजी और न ही रेडियोलॉजी के विभाग चलाने की मंजूरी निदेशालय तथा शासन से मिली है। महिला अस्पताल का अलग भवन निर्माणाधीन है।
बुद्ध की धरती पर भी है समस्या बरकरार
बस्ती। सिद्धार्थनगर में भी स्वास्थ्य सेवा का बुरा हाल है। मंडल मुख्यालय पर आए दिन इस जिले से मरीज सैकड़ों की संख्या में इलाज कराने पहुंचते हैं। इसमें मरीजों के धन और समय की अतिरिक्त हानि होती है। सिद्धार्थनगर में उसका बाजार, इटवा, खेसरहा, बसंतपुर, बेवा के अलावा मिठवल, जोगिया, नौगढ़, बर्डपुर, बढ़नी, भनवापुर, खुनियांव पीएचसी संचालित हैं। जिले में सीएमओ के अधीन 188 चिकित्सक के स्वीकृत पद के सापेक्ष पूरे डाक्टर तैनात नहीं हैं। इसके साथ ही जिला मुख्यालय पर संचालित संयुक्त चिकित्सालय में स्वीकृत 39 पद के सापेक्ष 32 की तैनाती है। जबकि टीबी चिकित्सालय में दो पदों पर डॉक्टर मौजूद हैं। सीएमओ डा. सदानंद पांडेय कहते हैं कि जिले को लेवल वन के 19 नए डॉक्टर मिलने हैं। इसमें से तीन ने ज्वाइन कर लिया है। शेष के आने पर आवश्यकतानुसार स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात कर दिया जाएगा।
क्या कहते हैं प्रबुद्ध नागरिक
बस्ती। एपीएनपीजी कालेज के प्राचार्य डा. बीपी सिंह कहते हैं कि किसी भी शहर के विकास में शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन और सड़कों की प्रमुख भूमिका होती है। लेकिन जिले की चिकित्सा में डॉक्टर्स तथा संसाधनों की कमी से यहां के मरीज विशेष परिस्थिति में गोरखपुर और लखनऊ जाने को विवश हैं। समाजसेवी तथा वरिष्ठ चिकित्सक डा. रमेश चंद्र श्रीवास्तव कहते हैं कि संसाधन और मैन पावर की कमी से अब सरकारी सेवा की स्थिति बदहाल है। सरकार को संसाधन और मैनपावर का संतुलन बनाकर अस्पतालों को चलाने का प्रयास करना होगा। तभी आम लोगों को चिकित्सा सेवा का समुचित लाभ मिलेगा।
स्वास्थ्य सेवाओं पर दिखेगा असर
बस्ती। मंडलीय अपर निदेशक चिकित्सा तथा स्वास्थ्य सेवा डा. सुभाष चंद्र का कहना है बस्ती में 53 और सिद्धार्थनगर में 19 लेवल वन के डॉक्टर्स शासन स्तर से भेजे गए हैं। इनके ज्वाइन करने के बाद इन दोनों जिलों में डॉक्टर संवर्ग की संख्या में वृद्धि हो जाएगी। इसका सकारात्मक असर मंडल की स्वास्थ्य सेवाओं पर दिखेगा। विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती करने के लिए मैंने तीनों जिलों के सीएमओ से विवरण लेकर शासन और महानिदेशक को पत्र लिखा है। उम्मीद है कि जल्द ही विशेषज्ञ मिल जाएंगे, जिनको मरीजों और संख्या के अनुपात के अनुसार वरीयता के आधार पर अस्पतालों में तैनात कराया जाएगा। संतकबीरनगर और सिद्धार्थनगर नवसृजित जिले हैं। इस लिए यहां सौ बेड से अधिक का अस्पताल होने के कारण मुख्यालय पर संयुक्त अस्पताल स्थापित है। इनमें भी सुविधा को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

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