मेरी पसंदीदा फिल्म/ लगे रहो मुन्नाभाई

Basti Updated Wed, 26 Sep 2012 12:00 PM IST
हममें भी गांधी का संदेश
यह बात कल्पना से परे लगती है कि महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर कोई मनोरंजक फिल्म बनाई जा सकती है, जो गांधी के संदेशों को रोचक ढंग से जनता तक पहुंचाई और आज के भौतिकवादी उपभोक्तावादी समाज में उनकी प्रासंगिकता प्रमाणित करे। किंतु 2006 में प्रदर्शित राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ ने यह कर दिखाया। संजय दत्त और अरशद वारसी के जीवंत अभिनय से सजी इस फिल्म में गांधी के संदेशों को टपोरियों की भाषा में पुनर्लेखित किया गया है और बेहद मनोरंजक तरीके से फिल्माया गया है। इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें गांधी स्वयं पर्दे पर दिखते हैं और वर्तमान भारतीय समाज की समस्याओं एवं सवालों का गांधीवादी हल बताते हैं।
‘लगे रहो मुन्ना भाई’ ने मेरे हिसाब से दो ऐतिहासिक कार्य किए हैं। पहला इसने ‘हम गांधी नहीं हैं’ कहकर समस्याओं से कन्नी काटने वाले समाज को ‘हममें भी गांधी हो सकता है’ तक पहुंचा दिया है। दूसरा, इसने शायद पहली बार भारतीय समाज में सिनेमा की अर्थवत्ता चिह्नित कर दी है। जो काम ‘रंग दे बसंती’ ने शुरू किया था उसे अंजाम तक ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ ने पहुंचा दिया है। हालांकि ‘गांधीगिरी’ शब्द पर बहुत सारे बुद्धिजीवियों को आपत्ति है लेकिन इतिहास गवाह है कि जब स्थापित शब्द अपना अर्थ खोने लगते हैं तो अचानक कोई नया शब्द उनकी जगह ले लेता है। इसका प्रमाण है फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद लगातार इस शब्द का चर्चा में बने रहना और बड़े से लेकर छोटे शहरों तक गांधीगिरी के प्रयोगों का खबर बनना। दलाई लामा के एक निकट सहयोगी और ‘तिब्बत -देश’ के संपादक विजय क्रांति ने दलाई लामा की चीन के प्रति नीति को गांधीगिरी की संज्ञा दी है। इससे जाहिर है कि गंभीर मुद्दों पर भी गंभीर लोग, इसका प्रयोग उपयुक्त मान रहे हैं। गांधीवाद का गांधीगिरी में रूपांतरण यदि गांधी को अधिक ग्राह्य, उपयोगी और प्रेरक बना दे तो इसमें परेशानी क्या है? इस अर्थ में ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ के महत्व को स्वीकार किया जाना चाहिए। गांधी पर उनकी मृत्यु से लेकर अब तक बनी फिल्मों पर मैं कुछ शोध कार्य कर रहा हूं। इस सिलसिले में अध्ययन के क्रम में मैने पाया कि हालिया वर्षों में गांधीजी पर कई फिल्में बनी है जो मोटे तौर पर तीन वर्गो में विभाजित की जा सकती हैं। पहले वर्ग में वे फिल्में आती हैं जो सीधे तौर पर गांधी के निजी अथवा सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भूमिका पर केंद्रित हैं। दूसरे वर्ग में ऐसी फिल्मों को रखा जा सकता है जिनमें गांधी पर्दे पर तो आते हैं किन्तु मुख्य भूमिका में नहीं। वे प्रसंगवश आते हैं कुछ क्षणों के लिए और तीसरे वर्ग में वे फिल्में आती हैं जो गांधी के सिद्धांतों, संदेशों, विचारों को प्रसारित करने वाली फिल्में हैं। ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ हमारे लिहाज से इस तीसरे वर्ग में आती है। इस वर्ग में आने वाली अन्य फिल्में हैं- स्वदेश (2001), मैंने गांधी को नहीं मारा (2005), शंकर दादा जिंदाबाद (तेलगू, 2007), रोड टू संगम (2009) और महात्मा (2009)।

लेखक डॉ. चंद्रभूषण ‘अंकुर’
गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं

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