बस्ती में जेई/एईएस के 44 नए गांवचिह्नित

Basti Updated Sat, 28 Jul 2012 12:00 PM IST
बस्ती। जिले के सैकड़ों गांवों में मासूम खतरे में हैं। पिछले तीन माह में जेई/एईएस प्रभावित 44 नए गांव चिह्नित किए गए हैं। पहले इन गांवों की संख्या 239 थी। नए गांव चिह्नित होने के बाद अब जेई/एईएस से प्रभावित गांवों की संख्या 283 तक पहुंच गई है। गांवों की संख्या बढ़ने से जिला प्रशासन के भी कान खड़े हो गए हैं। यही नहीं, आंकड़े बताते हैं कि में छह माह के भीतर एईएस से 11 मौतें हो चुकी हैं।
सरकारी महकमा अब भी जेई और एईएस को लेकर संवेदनहीन बना हुआ है। गोष्ठी और कार्यशाला, पंपलेट, पोस्टर के माध्यम से जागरूक करने का प्रोग्राम कागजी साबित हो रहा है। प्रशासन की मानें तो पिछले साल इस बीमारी से 23 मौतें हुई थीं। मगर तमाम ऐसी मौतें भी हुईं, जो प्रशासन के रिकार्ड में दर्ज नहीं हैं। तमाम दावों के बावजूद प्रभावितों की संख्या बढ़ना साबित कर रहा है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में खोट है। गांवों में बीमारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य, पंचायती राज, बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के साथ स्वयंसेवी संस्थाएं भी लगी हैं।

नहीं खरीदी गई फागिंग मशीन
प्रभावित गांवों में प्रधान को फागिंग मशीन खरीदने के लिए कमिश्नर की ओर से निर्देश दिए गए थे। मगर अधिकांश प्र्रधानाें ने अब तक फागिंग मशीन नहीं खरीदी। सीएमओ ने कमिश्नर को लिखा है कि ग्राम पंचायतों ने न तो फागिंग मशीन खरीदी और न ही जेई/एईएस से निपटने के लिए अन्य व्यवस्था की। इन ग्राम पंचायतों को एनआरएचएम और पंचायती राज विभाग की ओर से संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत धन रिलीज किया गया मगर, गांवों में जेई/एईएस से निपटने के समुचित इंतजाम नहीं किए गए।

टीकाकरण अभियान पर भी सवालिया निशान
स्वास्थ्य महकमे ने जेई/एईएस से निपटने के लिए टीकाकरण अभियान चलाया था। इसके लिए 2012 में 63331 लोगों को प्रतिरक्षित किया जाना था। सीएचसी और पीएचसी वार लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। विभाग ने लगभग 90 प्रतिशत टीकाकरण का दावा भी किया है।

एईएस के मिले 44 मरीज
संक्रामक रोग नियंत्रण कक्ष के प्रभारी डा. राकेश मणि ने बताया कि इस साल अब तक जेई/एईएस के 44 मरीजों को विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। इनमें 11 ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। वहीं सीएमओ डा. एसपी दोहरे कहते हैं कि यह सही है कि प्र्रभावित गांवों की संख्या बढ़ी है मगर, मरीजों की संख्या में कमी आई है। जेई का कोई केस इस साल रिपोर्ट नहीं हुआ है।

बन रही कार्ययोजना : डीपीआरओ
डीपीआरओ समरजीत यादव कहते हैं कि पंचायत राज विभाग को इस बार निर्मल भारत अभियान के तहत जेई/एईएस से बचाव के लिए निर्माण कार्य आदि कराना है। इसके लिए कार्ययोजना तैयार की जा रही है। केंद्र ने धन भी प्र्रदेश सरकार को रिलीज कर दिया है। कार्ययोजना तैयार होने के बाद इस दिशा में काम शुरू करा दिया जाएगा।

नहीं लगे इंडिया मार्का टू हैंडपंप
शासन ने प्रभावित गांवों में छोटे हैंडपंपों को तत्काल बंद कर इन पर लाल निशान लगाने के निर्देश दिए थे। इनकी जगह इंडिया मार्का-टू हैंडपप लगाने को कहा गया था मगर, वह निर्देश रद्दी की टोकरी में चला गया। इक्का-दुक्का गांवोें को छोड़ दें तो अधिकतर प्रभावित गांवों में छोटे हैंडपंप ही प्रयोग में लाए जा रहे हैं। जेई/एईएस प्रभावित गांव गनेशपुर, डारीडीहा, ढ़ोरिका, गिदही खुर्द, खीरीघाट, मड़वानगर, कलवारी, ओड़वारा, नगर बाजार, बोदवल, बानपुर, कुदरहा, गायघाट, एकटेकवा, बेलसड़, अमरौली शुमाली, दरियापुर, पिटाउट, नरखोरिया, असनहरा, बैदौला, भीवापार, भानपुर, हनुमानगंज, रुधौली, पिरैला नरहरिया आदि गांवों में छोटे हैंडपंप ही पेयजल का जरिया हैं।

जागरूकता का अभाव : प्रभारी डीएम
प्रभारी डीएम रामअरज मौर्य ने कहा कि लोगों में जागरूकता का अभाव है। इसी कारण वह इस बीमारी की जद में आ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग मच्छरदानी नहीं लगाते हैं। काम करने के दौरान अक्सर कपड़े निकाल देते हैं। इससे मच्छर काटने की आशंका बनी रहती है। इलाज के साथ सावधानी बरत कर ही जेई/एईएस से निपटा जा सकता है। विभागीय स्तर पर भी कुछ कमियों को भी उन्होंने स्वीकारा है।

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