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जिन हाथों से सेवा न हो वह शव के समान

Basti Updated Thu, 07 Jun 2012 12:00 PM IST
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बस्ती। मांगने से प्रेम की धारा टूट जाती है। प्रभु से कुछ मत मांगो, ईश्वर को अपना ऋणी बनाओ। जिन हाथों से श्रीकृष्ण की सेवा न हो, जो हाथ परोपकार न करें व हाथ शव के समान है। तन और मन को दंड दोगे तो पाप का क्षय होगा।
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संसारपुर फुटहिया चौराहे पर श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन व्यास पीठ से नेवासदास वेदांती ने कहा कि सत्य को समर्पित करने वाला ही सत्ता का अधिकारी है। सत्य स्वरूप परमात्मा के प्रति जब जीव का समर्पण होता है तभी कर्तव्य का ज्ञान होता है। कलियुग के प्रवेश, धर्म के दुखी होने, नारद के प्रयास और परमात्मा के अवतारों का विस्तार से वर्णन किया। कहा कि भागवत कथा के श्रवण से वासना की ग्रंथियां टूटती हैं। बैकुंठ में जो आनंद है, वही भागवत कथा में मिलता है। मंगलाचरण के महत्व का वर्णन करते हुए महात्माजी ने कहा कि सत्कर्मों में कई विघभन आते हैं। भगवान शिव का स्मरण मंगलमय है। उन्होेंने जो काम को जलाकर राख कर दिया, मनुष्य जब तक सकाम है उसका मंगल नहीं होता है। ईश्वर के अनेक स्वरूप है, किंतु तत्व एक है। ध्यान करने से ईश्वर और जीव का मिलन होता है। जगत की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश भी लीला है। कथा के मुख्य यजमान संजापी देवी ने कथा व्यास की वंदना कर पूजन अर्चन किया। इस अवसर पर रामचंद्र, कृष्णचंद्र सिंह, प्रेम चंद्र, ध्रुवचंद्र, श्याम चंद्र सिंह, महेश चंद्र सिंह, प्रद्युम्न शुक्ल, राजेश सिंह, अशोक कुमार पांडे, राम केवल यादव, शैलेंद्र विक्रम सिंह, शीला, मीरा, सपना, सत्या आदि श्रद्धालु भक्त मौजूद रहे।
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