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चार साल से कोई मिलने आता नहीं.. अंधेरे से डरता हूं मैं मां

अमर उजाला नेटवर्क, बरेली Updated Sat, 15 Feb 2020 02:33 PM IST
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गुलियन बैरे सिंड्रोम नाम की उस बीमारी पीड़ित निशांत
गुलियन बैरे सिंड्रोम नाम की उस बीमारी पीड़ित निशांत - फोटो : अमर उजाला
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सार

  • बीमारी ने निशांत को बनाया लावारिस
  • लाइलाज है गुलियन बैरे सिंड्रोम नामक बीमारी
  • दो बेटियों के साथ शहर में ही हैं परिवार वाले

विस्तार

अथाह जीवन और दूर-दूर तक कोई अपना नहीं। शरीर ने बोझ उठाने से इनकार किया तो जन्म देने वाले मां-बाप ने भी छोड़ दिया। अब 16 बरस के हो चुके निशांत की खता सिर्फ इतनी सी थी कि कुदरत ने उसे गुलियन बैरे सिंड्रोम नाम की उस बीमारी के साथ पैदा किया जिसने बचपन खत्म होने से पहले ही उसे अपाहिज बना दिया। शायद बुढ़ापे की लाठी बनने की जिस उम्मीद के साथ मां-बाप ने उसे पैदा किया था, उस उम्मीद को टूटते देखा तो उससे नाता ही तोड़ लिया। निशांत की जिंदगी के चार साल एसआरएमएस में गुजर चुके हैं जहां अस्पताल का स्टाफ ही उसका पालक बना हुआ है। दिमागी तौर पर आम लोगों जैसा स्वस्थ निशांत धीरे-धीरे बड़ा हो रहा है और उसके जहन में वह शून्य भी बड़ा होता जा रहा है जिसके घेरे में यह सवाल भी बड़ा हो रहा है कि उसके मां-बाप ने उसे क्यों छोड़ा होगा और फिर कभी उसका हाल भी लेने क्यों नहीं आए।

लाइलाज बीमारी ने निशांत को बनाया लावारिस

एसआरएमएस इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज का पीआईसीयू ही करीब चार साल से निशांत का ठिकाना है। उसकी पहचान बेड नंबर सात से होती है। उसकी शून्य में केंद्रित आंखें हमेशा उसके मन की बेचैनी जताती महसूस होती हैं। गुलियन बैरे सिंड्रोम उसे साफ-साफ बोलने की इजाजत नहीं देती। मां-बाप के अस्पताल में छोड़कर जाने के बाद तीन साल तक उसे संभालना मुश्किल था लेकिन एक साल से उसमें काफी बदलाव आया है। उसकी देखभाल करने वाला अस्पताल के स्टाफ के मुताबिक शायद इसकी वजह यह है कि अब उसने भी मान लिया है कि उसके मम्मी-पापा अब कभी नहीं आएंगे।
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निशांत के पिता का नाम अस्पताल के रिकॉर्ड में कांता प्रसाद दर्ज है। कांता प्रसाद ने अगस्त 2016 में निशांत को एसआरएमएस में भर्ती कराया था और फिर किसी को कुछ बताए बगैर 17 अगस्त 2016 को अपनी पत्नी के साथ उसे वहीं छोड़कर चुपचाप चले गए। अस्पताल के स्टाफ करीब महीने भर तक निशांत के मम्मी-पापा के लौटने का इंतजार करता रहा लेकिन फिर समझ गया कि उन्होंने दिल पर पत्थर रखकर उससे अपना पिंड छुड़ा लिया है।

मां-बाप के प्यार और अपनी दो बहनों की राखी के बगैर ही निशांत धीरे-धीरे बड़ा हो रहा है और उसकी जिंदगी के चार साल अस्पताल में कट चुके हैं। अस्पताल के नर्सिंग स्टाफ के लिए भी शुरू में काफी समय वह एक उलझन से ज्यादा कुछ नहीं था लेकिन फिर प्यार-दुलार का रिश्ता कायम हो गया। अब नर्सिंग स्टाफ ही उसकी देखभाल की जिम्मेदारी उठा रहा है और हर साल उसके बर्थडे का जश्न भी मनाता है। निशांत की लाइलाज बीमारी गुलियन बैरे सिंड्रोम का इलाज कर रही डॉ. संध्या उसका लगातार चेकअप करती हैं। शरीर को हिलाने में भी असहाय निशांत की देखभाल की जिम्मेदारी एक नर्स ने अपने हाथों में ले रखी है।

लाइलाज है गुलियन बैरे सिंड्रोम

निशांत का इलाज कर रही डॉ. संध्या के मुताबिक गुलियन बैरे सिंड्रोम का कोई इलाज नहीं है। शुरुआत में पीड़ित के शरीर में दर्द होता है और फिर उसकी मांसपेशिया कमजोर होती जाती हैं। धीरे-धीरे वह लकवाग्रस्त हो जाता है। इस सिंड्रोम का असर तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है, तंत्रिकाएं दिमाग के आदेशों का पालन करना छोड़ने लगती हैं। रोगी को किसी चीज की बनावट तक का पता नहीं चल पाता है। जैसे-जैसे समय गुजरता है, उसका शरीर सर्दी, गर्मी जैसी अनुभूति को भी महसूस करना छोड़ने लगता है। शरीर अपाहिज हो जाता है लेकिन दिमाग सक्रिय रहने के साथ सोचने-समझने की शक्ति बरकरार रहती है।

समाज और मेडिकल कॉलेज से बचने को अवध धाम कॉलोनी छोड़ गया परिवार

निशांत के मामले में उसके पिता कांता प्रसाद और उनकी पत्नी ने खुद को इतना कठोर बना लिया कि अस्पताल प्रबंधन के कई बार संपर्क करने और वापस आने कहने के बावजूद उन्होंने अस्पताल आने से साफ इनकार कर दिया। अस्पताल स्टाफ के मुताबिक अस्पताल से कई बार स्टाफ को कांता प्रसाद के घर भेजा गया लेकिन काफी समझाने-बुझाने और भावनात्मक तौर पर उकसाने के बावजूद उन्हाेंने बेटे को वापस लेने से मना कर दिया।

अस्पताल प्रबंधन सोचता रहा कि कुछ समय बाद निशांत के मां-बाप का दिल खुद बेटे के लिए पसीजेगा लेकिन बाद में पता चला कि इज्जतनगर की जिस अवध धाम कॉलोनी में कांता प्रसाद अपने परिवार के साथ रहते थे, उसे भी उन्होंने छोड़ दिया है। कॉलोनी के लोगों को यह तक नहीं बताया कि अब वह कहां रहने जा रहे हैं। यही नहीं अपने मोबाइल नंबर भी बदल दिया। कॉलोनी वालों के मुताबिक कांता प्रसाद प्रापर्टी डीलिंग का काम करते हैं और पैसों की ऐसी कोई आर्थिक समस्या उनके सामने नजर नहीं आई जिसकी वजह से उन्हें बेटे को लावारिस छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा हो।

कॉलोनी में बनी पहचान.. बेटे को छोड़ने वाला बाप

अवध धाम कॉलोनी में दो हजार से ज्यादा मकान बने है। कई गलियां है, किसी भी गली में अगर आप सिर्फ कांता प्रसाद का मकान पूछेंगे तो शायद कोई नहीं बता पाएगा। लेकिन अगर किसी भी गली में किसी से भी यह पूछ लें कि उनका मकान कहां है जो अस्पताल में चार साल पहले अपना बेटा छोड़ आए थे तो लोग तुरंत पता बताने लगते हैं। बेटे को छोड़कर आना ही अवध धाम कॉलोनी में कांता प्रसाद की पहचान बन गई है।

दो बेटियों के साथ शहर में ही हैं परिवार वाले, एक साल पहले दूसरा बेटा हुआ

जिस समय कांता प्रसाद अस्पताल में उसे लावारिस हालत में छोड़कर चले आए थे, उस समय वह उनका इकलौता बेटा था और उसकी उम्र 12 साल थी। अवध धाम कॉलोनी के कुछ लोगों के मुताबिक निशांत से बड़ी उसकी दो बहनें थी। जब वह बीमार हुआ तो कॉलोनी से भी कई लोग उसे अस्पताल में देखने गए थे। बाद में कांता प्रसाद उसका इलाज न करा पाने की बात कहकर उसे छोड़कर चले आए, इसके बाद कभी लेने ही नहीं गए। पड़ोसियों ने बताया कि अभी करीब एक साल पहले कांता प्रसाद फिर एक बेटे के पिता बने हैं।

दिमाग बता देता है- अब तुम किसी लायक नहीं

मनोवैज्ञानिक डॉ. हेमा खन्ना बताती हैं कि गुलियन बैरे सिंड्रोम जैसी बीमारी में शरीर के साथ दिमाग भी धीमे-धीमे काम करना बंद कर देता है। ऐसे में दिमाग में भाव पैदा होने बंद हो जाते हैं। इससे मनुष्य अच्छा, बुरा, हंसी, खुशी की बात सोच ही नहीं पाता है। धीमे-धीमे मरीज को यह समझ आने लगता है कि वह किसी लायक नहीं रह गया है।

अपनों ने छोड़ा तो सुधबुध खो बैठीं ये महिलाएं

जिला अस्पताल के भी आईसोलेशन वार्ड में दो महिलाएं भर्ती हैं जो करीब तीन महीने पहले भर्ती हुई थीं। पुलिस ने सेप्टिक से हुई बुरी हालत में उन्हें यहां भर्ती कराया था। यह बोलने-चलने में अक्षम हैं। अस्पताल के लोग कहते हैं कि उम्र के अंतिम पड़ाव में परिवार के ही लोग ऐसे लोगों को बोझ मानकर रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड या अस्पताल में छोड़ जाते हैं। सामाजिक संस्थाओं या पुलिस की मदद से इनको इलाज के लिए अस्पताल भर्ती किया जाता है। ज्यादा उम्र में कमजोर याददाश्त और गंभीर बीमारियों से पीड़ित ऐसे वृद्ध पहचान तक नहीं बता पाते। इससे परिवार की पुष्टि नहीं हो पाती और अस्पताल में इनकी एंट्री ‘अज्ञात’ नाम से होती है। यहां 12 दिसंबर और 30 नवंबर 2019 को दो ऐसी महिलाएं ही भर्ती की गईं। जिनके बारे में अस्पताल प्रशासन ने सभी थाने और समाचार पत्रों के माध्यम से सार्वजनिक प्रकाशन भी किया गया लेकिन उनके बारे में जानकारी करने कोई नहीं आया।
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