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खुशी- अनसमझी, अनसुलझी, अनजानी, अनपहचानी शक्ति

Bareily Bureauबरेली ब्यूरो Updated Sun, 14 Jul 2019 09:06 PM IST
डॉ. मंजू सिंह, गाजियाबाद
डॉ. मंजू सिंह, गाजियाबाद - फोटो : अमर उजाला, बरेली
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काफी आम सी लगेगी पढ़ने में, पहले भी कई बार सुनी होगी परंतु शायद महसूस ना कर पाये हों। 
मैंने भी पहली बार महसूस की, इसलिए फिर से सुनी हुई बातें लिखने की इच्छा हुई। 
हकीकत है, पर रोमांचक कम लगेगी। - डॉ. मंजू सिंह
हमारे घर के चौकीदार की कहानी, एक गरीब किसान, मजदूर की कहानी, मध्य प्रदेश के महुआ के एक छोटे से गांव से आकर दिल्ली में रहने लगा। शादी हुई, दो बच्चे, खुशी और आनन्द, हुए। पति-पत्नी; सोमनाथ और उमा, दोनों मालिश का कार्य करते और बच्चों का लालन-पालन करते। दोनों बच्चे पास ही के एक प्राईवेट स्कूल में पढ़ने जाते, टयूशन जाते, स्कूल में अव्वल आते,। माह में एक-आध बार बच्चों से सुनने को मिलता, आंटी- आज मंगल बाजार जायेंगे। नये कपड़े लाएंगे, कुछ चाट पकोड़े भी खाकर आएंगे। बूढ़े मां बाप और छोटे भाई के लिए गांव में पैसे भी भेजता। उनका मोबाइल रिचार्ज करवाता। कभी-कभी तो सोमनाथ ऐसा एहसास देता था कि जैसे किसी मीडिल क्लास का बच्चा अमेरिका पहुंच गया हो। बेसमेंट में मच्छर बहुत होने के कारण, बच्चे अक्सर बीमार हो जाते थे। मन में कई बार आता कह दू कि सोमनाथ कोई छोटा सा कमरा किराये पर लेकर क्यूं नहीं रह लेते। फिर खुद ही जवाब मिल जाता अरे कमरा भी कोई इससे अच्छी जगह थोड़े ही ले पायेगा। कुल मिलाकर एक अनुभूति होती कि सब ठीक-ठाक चल रहा है, सिर्फ एक कमी कि काश सोमनाथ शराब पीनी छोड़ दे।
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कभी-कभी तो लगता था कि उमा ही सोमनाथ से ज्यादा समझदार और चतुर है। मुझे कहती, आप मेरा आधार कार्ड बनवा दीजिए और मेरा बैंक में खाता खुलवा दीजिए। बस, मैडम आप तो मेरा बीपीएल कार्ड बनवा दीजिए और मुझे गैस सिलेंडर भी दिलवा दीजिए। छोटा सिलेंडर हर हफ्ते खत्म हो जाता है ना।

उसकी बातें सुनकर तो मोदी जी के मन की बात, उज्जवला योजना, जन-धन योजना जाने क्या- क्या याद आने लगती। फिर सोचती, भला इस बेचारी को क्या पता कि बीपीएल कार्ड बनना कोई मजाक थोड़े ही है। खैर, कुछ तो हुआ, आधार कार्ड बन गये, खाता भी खुल गया और उमा ने कुछ पैसा बचाकर खाते में डालना भी शुरू कर दिया। जब कभी उमा को बच्चों के पोषण को लेकर समझाती तो वो पूरे गर्व से कहती कि रोज पूरा एक किलो दूध मंगवाती हूं और दाल- सब्जी बनाती हूं। कभी-कभी तो मुर्गा भी बनाते हैं। मैडम जी, मेहनत का काम करते हैं, खायेंगे नहीं तो कमायेगें कैसे?

बहुत समय स्वास्थ्य विभाग में काम करने के बाद भी मेरे अकेलेपन ने मेरे मन का द्वंद समाप्त न किया था कि छोटा परिवार-सुखी परिवार। बार-बार मन में आता था कि भगवान फिर मौका दे तो मैं दो नहीं चार बच्चे पैदा करती। अरे, थोड़ा खाने का ही तो खर्च बढ़ता। किताबें-कपड़ें तो पुराने वाले ही काम आ जाते। फिर किसी बुजुर्ग की बात यह पछतावा और बढ़ा देती कि देखो फलां के चार बेटे थे। चारों डॉक्टर बन गए और सभी की शादी डाक्टरनियों से हुयी। अरे वाह, घर का अस्पताल और घर का डॉक्टर मजा आ गया।
एक दिन उमा मेरे पास आई और बोली, कुछ बताओ क्या कँरू, 25 दिन चढ़ गये है,ं महीना नहीं आया। मन से पहली प्रतिक्त्रिस्या तो यही हुई, अरे क्या है दो ही तो बच्चे हैं अगर एक और हो गया तो क्या होगा। वैसे भी इसका बेटा तो बहुत बीमार होता रहता है, परन्तु भावनाओं को दबाते हुए मैंने समझाया, इधर-उधर की गोली मत खाना, अगर बच्चा नहीं चाहिए तो सीधा सरकारी अस्पताल जाकर डाक्टर से बात करो। पर ना जाने मेडिकल स्टोर से लाकर क्या-क्या गोली खाई, परेशानी तो बहुत हुई पर बच्चा नहीं गिरा। मुझे लग रहा था कि कहीं मेरे मन की दुआ तो काम नहीं कर रही।

खैर, निर्णय यह हुआ कि इस बार तो बच्चा आने दो, पर डिलेवरी के साथ-साथ आपरेशन भी करवा देंगे। गर्भ के साथ-साथ मेरे भी कुछ सामाजिक दायित्व बढ़ने लगे और स्वास्थ्य विभाग के अनुभव का उपयोग। सोमनाथ से बहुत जोर-जबरदस्ती कर मैंने उन्हें नर्स बहन के पास भेजा। आयरन की गोली लेकर आ गये। हां बहन जी टीका लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड की शर्त लगा दी। नर्स बहन जी ने बगैर कुछ खून-पेशाब की जांच करे सब कुछ ठीक-ठीक चढ़ा दिया था, ममता कार्ड पर। खैर, बहुत जद्दोजहद के बाद, जब कार्ड मेरे पास तक पहुंचा और असलियत पता चली तो मैंने फिर नर्स बहन जी को फोन किया कि बगैर जांच किये ये सब कैसे भर दिया तो उसने बड़ी सहजता से कहा, ठीक है कल फिर से भेज देना, हम जांच कर देंगे। मैं निरउत्तर थी। मुझे समझ आ रहा था कि शिकायत करके भी कुछ होने वाला नहीं। परन्तु उमा के जीवन में वो कल कभी नहीं आया। खैर वक्त करीब आता गया, मगर क्या-क्या हुआ इसे देखकर मन कसमकस में था।

उमा का मालिस का काम बंद हो गया था। अब वो ज्यादातर घर में रहने लगी थी। बच्चों का टयूशन यह कहकर बंद कर दिया गया कि टीचर दो दिन छुटटी करती है और बच्चों को पीटती भी है। नादान बच्चे खुश थे, क्योंकि अब उन्हें खेलने को ज्यादा समय मिलने लगा था। मंगल बाजार का जिक्त्रस् बंद होने लगा। एक तो उमा का कमाना बंद और खाना पकाने में भी परेशानी होने लगी तो बच्चों का खाना भी कम हो गया। अब सोमनाथ कमाने जाये या खाना बनाये। फिर सर्दियों में कुछ काम भी कम मिल रहा था। रिश्तेदारों के आने का खर्च भी बढ़ रहा था। बच्चों का स्कूल जाना कम होने लगा था। कारण अनेक कभी आँख नहीं खुली, कभी नाश्ता नहीं बना, कभी स्कूल कौन छोड़ने जाता, पापा तो मालिश करने गये थे। धीरे-धीरे पता लगा कि सोमनाथ ने बच्चों की फीस ही नहीं भरी, जिससे बच्चे इम्तिहान ही नहीं दे पाये। कहीं ना कहीं मन की कशमकश खत्म ना होती कि गरीबी में मर्द की शान के पीछे कौन सी शक्ति छुपी थी। इस झटके ने मेरे अकेलेपन के सारे भ्रम तोड़ दिये। अब मन पहले से ज्यादा उदास था। उमा को दिन-रात समझाती कि डिलीवरी अस्पताल में ही करवाना और नसबंदी साथ-साथ ही करवा आना। उमा ने एक और प्यारी सी बच्ची को अस्पताल में जन्म दिया, पर अफसोस नसबंदी से डर गई और बगैर नसबंदी कराए घर आ गई।

इन सबके बीच, मैं बच्चों को अपने पास बुलाती, पढ़ाती और मेरी बच्चों से घनिष्नठता बढ़ती गई। खुशी अपने दिल की बात मुझे कह देती। एक दिन खुशी ने कहा कि आंटी, क्या मैं अपने बाबू, छोटी बहन, के जैसे गोरी नहीं हो सकती, आपके जैसे मेरा रंग नहीं हो सकता। मैं, आज खुशी में अपना बचपन देख रही थी, क्योंकि मेरे बचपन का नाम भी कल्लो था। मेरा रंग काला होने के कारण। मेरे छोटे भाई और खुशी की छोटी बहन में उम्र का भी इतना ही फर्क था करीब 7-8 वर्षों का। मैंने भी अपने छोटे भाई की बहुत देखभाल की थी। शायद उसकी और मेरी किस्मत में फर्क था पिता का। मेरे पिता पढ़े लिखे होने के साथ-साथ सरकारी नौकरी में भी रहे।

अब खुशी की जिम्मेदारियां बदलने लगीं। कहती आंटी बाद में पढ़ाना, अभी मुझे पानी भरना है और बरतन भी साफ करने हैं। मुझे बाबू और मम्मी के लिए पानी भी गर्म करना है। मैं डांटती कि आजकल तेरा पढ़ाई में बिल्कुल ध्यान नहीं है। मेरी थोड़ी बहुत डांट तो यह कहकर सहती कि आप मेरी मैडम भी तो हैं। मुझे पढ़ाती जो हो आपकी डांट मुझे बुरी नहीं लगती। शायद खुशी को जो पढाई पहले खेल से कम अच्छी लगती थी आज काम के बोझ के आगे बेहतर लगने लगी थी।
आंटी, अगर घर का काम नहीं करूंगी तो पापा पीटेंगे, बहुत जोर से मारते हैं, डर लगता है इसलिए जो भी पापा-मम्मी कहते हैं मैं तुरंत कर देती हूं। अब बाबू करीब एक महीने की हो गई थी। खुशी, मुझे कह रही थी कि आंटी कहां चली गई थी, आपके माथे पर टीका लगा है। क्या मंदिर घूमने गई थीं। बहुत पैसा लगा होगा। ये पौधे क्यूं खरीद कर लाईं, पापा कहते हैं कि ज्यादा खर्चा नहीं करना चाहिए। अभी आम बहुत मंहगा है ना, आंटी। और वो बोले जा रही थी हाँ, आंटी मैं आपको एक बात तो बताना भूल ही गई कि अब मुझे पूरा खाना बनाना आ गया है। मैं दाल छोंक लेती हूं, चावल बना लेती हूं और मैने रोटी बनानी भी सींख ली है। मेरे पास कोई जवाब ना था क्योंकि इतना तो मेरी 25 वर्ष की बेटी को भी नहीं आता। मैंने बात बदली और डांटकर कहा, क्या मेरे पीछे से एक भी बार पढ़ाई की, सच बोलना। खुशी और आनन्द के इनकार ने मुझे झंझोर दिया था। यह गुप्त शक्ति, अनपढ़, गरीब, मजबूर, लाचार औरत बनती मजदूर की बेटी, इस देश को चला रही है। । 

अब स्थितियां बदल रही थीं। सोमनाथ को कुछ काम कहो तो वह कहता खुशी से करवा लेना। मेरे मना करने पर कि मैं खुशी से नहीं करवाउंगी, तुझे ही करना होगा तो मजबूरी दिखाने लगता कि मुझे मालिश करने जाना है, शाम को सब्जी लाने को भी पैसे नहीं हैं।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि शिक्षा के व्यवसायिक रूप को दोष दूं या सरकारी स्कूलों और सरकारी स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर दोष मडूं। इस उलझती पहेली को समझने में ना कामयाब कि गरीब के लिए सबसे जरूरी क्या- मकान या बैंक खाता या गैस सिलेंडर या सरकारी अस्पतालों की सुविधायें या सरकारी शिक्षा या दारू पर रोक या अच्छे रोजगार के साधन। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि जो लोग तनख्वाह लेकर अपने कृर्तव्यों से विमुख हैं या अपने दायित्वों को दिल से पूरा नहीं करते उनके लिए सरकार कौन सी योजना लाए। इन सबके बीच जो मध्यम व उच्च वर्ग जो इन सब सरकारी सुविधाओं का भरपूर लाभ उठा रहा है और ठसक भी दिखा रहा है।
मगर एक प्रश्न, अगर हर छोटा और गरीब किसान अपना गांव छोड़कर शहर की ओर भागता रहा तो शहरी कहां जाएंगे। यदि इस प्रकार हर किसान मजदूर में परिवर्तित होता रहा तो यह समाज कब तक इस बोझ को उठाने में कामयाब होगा। जब किसान-मजदूर की भूख मिटनी बंद हो जायेगी तो क्या ठसक जनता चैन से जी पायेगी।

आज मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं जिस भगवान की तलाश में इतनी दूर घूमने गई थी वह कहां है? मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि जिन अपनों को हम गरीबी के दलदल में छोड़ आये उन्हें वहां से कैंसे निकालें। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे पढ़े-लिखे, अच्छे कमाते-खाते समाज में गरीबों का मर्म कैसे भरूं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं किसान-मजदूर, आम आदमी के हाथ पर कमल कैसे खिलाऊं। इसी कमसकस में मैं, खुशी और आनन्द गमलों में मिट्टी भरने में लग गये। नये पौधे जो लगाये थे काश भगवान खुशी और आनन्द को वही पुराने मां-बाप लौटा दें।
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