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इस कायनात के लिए किताबों को बचाना होगा

बरेली Updated Mon, 01 Dec 2014 02:04 AM IST
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 साहित्यकार समाज को दर्पण दिखाते हुए जो रच रहे हैं उसमें बेहतर जीवन की परिकल्पना होती है। इस साहित्य में इंसान के लिए जीवन का ज्ञान है। जीवन जीने की कला अलग-अलग धर्म ग्रंथों में है और वह भी पुस्तकों में उपलब्ध है, इसलिए किताबों का महत्व और बढ़ जाता है। अमर उजाला की ओर से आयोजित पुस्तक मेेले के समापन के मौके पर ‘साहित्य, समाज और किताबें’ विषय पर हुई विचार गोष्ठी में साहित्यकारों के विचार कुछ इस तरह सामने आए।
 ‘पृथ्वी पर प्रलय की संभावना है/आओ चांद पर पहुंचा दें कुछ किताबें/ थोड़े खिलौने और दस पांच तितलियां/ तितलियां फूलों को ढूंढ़ेंगी/खिलौने बच्चों को/और किताबें को जरूरत पड़ेगी मनुष्यों की।’ साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी ने इस कविता को मौजूदा परिदृश्य से जोड़ते हुए कहा कि इतिहास विरोधी समय परंपरा और संस्कृति विरोध भी होता है। किताबें पुस्तकालय और सरकारी खरीद में रिश्वत की तरह हो गई हैं। पाठक कहां है, पता ही नहीं। वरिष्ठ कथाकार सुकेश साहनी ने मक्सिम गोर्की का जिक्र करते हुए कहा कि यह दुनिया ही सबसे बड़ी पाठशाला है। साहित्य संस्कारित करता है लेकिन अगर रचनाकार खुद को विद्वान समझकर साहित्य रचता है तो साहित्य बोझिल हो जाता है। मन में आने वाले विचार ही किताबों की शक्ल में प्रभावी बन पाते हैं। आधारशिला के संपादक दिवाकर भट्ट ने कहा कि अच्छी पत्रकारिता भी साहित्य है। अच्छी पत्रकारिता भी अगर समाज को दिशा देती है तो वह साहित्य के माहौल को समृद्ध करने के साथ पढ़ने की अभिरुचि भी पैदा करती है।
डॉ. अवनीश यादव ने कहा कि विद्यार्थी जीवन में जिस तरह की किताबें पढ़ेंगे तो जीवन भी उसी तरह ढल जाएगा लेकिन हम ऐसी किताबें से वंचित हो गए हैं। नवगीतकार रमेश गौतम ने कहा कि साहित्य समाज को ऐसी दिशा दे कि समाज अपनी सभी समस्याओं का समाधान उसमें पा सके। वरिष्ठ साहित्यकार रंजीत पांचाले ने कहा कि कवि सम्मेलन और मुशायरों की भूमिका बहुत अहम होती है। जब तक ये ईमानदारी से होते रहे, तब तक शहर में दंगे जैसे हालात नहीं पैदा हुए। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मुरारी लाल सारस्वत का कहना था कि सबका हित जिसमें समाहित हो, वही साहित्य है। सुरेश ठाकुर ने कहा कि साहित्यकार समाज के पैरोल पर लिखने वाला व्यक्ति नहीं है। वह अपने आपको अभिव्यक्त करता है। वरिष्ठ लेखिका निर्मला सिंह ने कहा कि साहित्य और बच्चों के बीच साहित्यकार ऐसा पुल बनाएं जो बच्चों के लिए फायदेमंद हो। उनके लिए उपदेशपरक किताबें न लिखें। डॉ. राहुल अवस्थी ने कहा कि सवालों को साहित्य में लाने की कोशिश नहीं हो रही है। इसलिए भी साहित्य लोगों से दूर हो रहा है। डॉ. प्रीति शर्मा ने कहा कि युवा साहित्य से दूर भाग रहा है। इसके लिए चिंतन-मनन के साथ ठोस उपाय की जरूरत है। कार्यक्रम के अंत में आभार व्यक्त करते हुए अमर उजाला के संपादक दिनेश जुयाल ने कहा कि साहित्यकार अपने विचारों को गढ़ता है, शब्दों को गुंथता है, उसमें खुद उत्प्रेरक बनता है और पेन से उसमें धार देकर किताब के रूप में निकालता है लेकिन अब तो इंटरनेट में किताबें घुस गई हैं। कार्यक्रम का संचालन वृद्धि गुप्ता ने किया।

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