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मां की विरासत सहेजने की जिम्मेदारी वरुण पर, पीलीभीत में सपा के हेमराज से है सीधी टक्कर

राजेन्द्र सिंह, अमर उजाला, पीलीभीत Updated Mon, 22 Apr 2019 06:29 AM IST
भाजपा सांसद वरुण गांधी
भाजपा सांसद वरुण गांधी - फोटो : amar ujala
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मां मेनका गांधी की पीलीभीत लोकसभा सीट पर भेजे गए वरुण गांधी को इस बार सपा के हेमराज वर्मा से सीधी टक्कर मिल रही है। नेपाल व उत्तराखंड बॉर्डर से सटी यह सीट भाजपा के ‘गांधी परिवार’ का गढ़ बनी हुई है। मेनका यहां से छह बार और वरुण एक बार सांसद रह चुके हैं। वरुण के सामने मां की विरासत सहेजने की तो गठबंधन उम्मीदवार हेमरान के सामने उनका किला भेदने की चुनौती है। मेनका इस बार सुल्तानपुर से मैदान में हैं। 
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हिमालय की तराई में बसे और गोमती नदी के उद्गम स्थल पीलीभीत से ही वरुण ने 2009 में संसदीय राजनीति में एंट्री की थी। बिगड़े बोलों के बावजूद वह 2.81 लाख मतों से लोकसभा चुनाव जीते थे। भाजपा ने 2014 में उन्हें सुल्तानपुर से उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस ने समझौते में यह सीट अपना दल (कृष्णा पटेल) को दी थी। तकनीकी कारणों से अपना दल का प्रत्याशी नहीं उतारा जा सका। लिहाजा, वरुण का मुख्य मुकाबला बसपा-सपा-रालोद गठबंधन के सपा प्रत्याशी हेमराज वर्मा से है। हालांकि, प्रसपा (लोहिया), जनता दल (यू) व निर्दलीय सुरेन्द्र कुमार गुप्ता समेत कुल 13 उम्मीदवार मैदान में हैं।

कभी सोशलिस्टों का गढ़ रही यह सीट: वर्ष 1989 में मेनका पीलीभीत आईं तो जनता ने उन्हें हाथों-हाथ लिया। वह 1989 व 1996 में जनता दल, 1998 व 99 में निर्दलीय और 2004 व 2014 में भाजपा उम्मीदवार के रूप में विजयी रहीं। 1991 में भाजपा के परशुराम ने उन्हें पराजित कर दिया था। पीलीभीत लोकसभा सीट पर कांग्रेस 13 चुनावों में से केवल तीन बार जीत पाई। 1952 के पहले चुनाव में कांग्रेस के मुकुंद लाल अग्रवाल चुनाव जीते लेकिन उसके बाद प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के मोहन स्वरूप 1957, 62 व 67 में यहां से सांसद चुने गए। 1971 में वह कांग्रेस में चले गए तो यह सीट कांग्रेस को मिल गई। इसके बाद सिर्फ 1984 की लहर में कांग्रेस चुनाव जीत सकी है। 

पिछड़ों व अन्य वर्गों में सेंध लगा रही भाजपा
वरुण गांवों में नुक्कड़ सभाओं में कांग्रेस व राहुल गांधी पर हमला करने के बजाय अपनी बात रख रहे हैं। कह रहे हैं, तीन लाख से ज्यादा वोटों से जिताएंगे तो वह सुपरमैन की तरह उनका काम करेंगे। वर्ष 2009 के चुनाव के विपरीत उनका भाषण संयत है। कई जगह उनसे नाराजगी भी है लेकिन कई लोग ऐसे भी मिले कि नाराजगी के बावजूद मोदी को पीएम बनाने के लिए वरुण को वोट देंगे। सपा के हेमराज वर्मा को लोध-किसान के साथ ही 28-30 फीसदी मुस्लिमों, अनुसूचित जाति व अन्य पिछड़ी जातियों के वोट की आस है। मुस्लिमों को छोड़कर इन सभी में भाजपा भी सेंधमारी करती दिख रही है। इस सीट पर मुस्लिमों के बाद कुर्मी, किसान-लोध, एससी, सिख-पंजाबी व अन्य पिछड़े मतदाता निर्णायक माने जाते हैं।

पहले जैसा आसान मुकाबला इस बार नहीं
कई चुनावों से एकतरफा जीत हासिल करने वाली भाजपा को गठबंधन उम्मीदवार से कड़ी चुनौती मिल रही है। आसाम चौराहे के पास फर्नीचर की दुकान चलाने वाले मनोज अग्रवाल कहते हैं कि  क्षेत्र के लोगों में वरुण से नाराजगी है, लेकिन मोदी के नाम पर वोट दे रहे हैं। मंडी समिति के बाहर दुकान करने वाले तरुण शुक्ला कहते हैं, मुकाबला कड़ा है लेकिन, भाजपा चुनाव जीत जाएगी। बरखेड़ा विधानसभा क्षेत्र के ज्योरह कल्याणपुर गांव में रामदीन, रघुनंदन व टीआर गंगवार भी कड़ी टक्कर मान रहे हैं। किसानों की बात कहां सुनी गई? धरना-प्रदर्शन के बाद गन्ना मूल्य भुगतान साल भर बाद मिल रहा है। सरकारी क्रय केंद्रों के बजाय बाजार में कम दामों पर गेहूं बेचना पड़ रहा है। पहली बार के मतदाता आलियापुर के सुगम वर्मा कहते हैं, किसे वोट करना है, अभी तय नहीं है।

किसान संगठन ने किया नोटा का ऐलान
वर्ष 2014 में पीलीभीत में 11521 मतदाताओं (1.12 फीसदी ने) नोटा का बटन दबाया था। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के जिला संयोजक यूसुफ मलिक बताते हैं कि किसानों के मुददों पर लोग दोनों दलों से नाराज हैं। संगठन के पदाधिकारी व सक्रिय कार्यकर्ता नोटा का बटन दबाएंगे। 

बांसुरी नगरी के असल मुद्दे दरकिनार
पूरे चुनाव पर जातीय समीकरणों व मोदी फैक्टर का असर है। लिहाजा बांसुरी नगरी के रूप में मशहूर पीलीभीत के बुनियादी मुद्दे दरकिनार हैं। आए दिन बाघ के हमलों से मौत, आवारा पशुओं से फसलों को नुकसान, गेहूं व गन्ना किसानों की दिक्कतें, रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य पर सत्ता पक्ष या विपक्षी खेमे में खास चर्चा नहीं हो रही।

खास बातें 
पीलीभीत से मेनका गांधी 6 बार और वरुण गांधी एक बार सांसद रह चुके हैं।
भाजपा ने मेनका व उनके बेटे वरुण की सीटों को आपस में बदल दिया है। 
अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस केवल 3 बार चुनाव जीती है।
कांग्रेस ने गठबंधन में यह सीट अपना दल (कृष्णा) के लिए छोड़ी थी। तकनीकी कारणों से उसका उम्मीदवार नहीं उतारा जा सका।

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