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तीन गांवों ने लटका रखा है मामला

Bareilly Updated Tue, 12 Feb 2013 05:31 AM IST
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बरेली के इतिहास में डेवलपमेंट के किसी प्रोजेक्ट को लेकर शायद ही इतनी बाधाएं सामने आई हों, जितनी बड़ा बाईपास को लेकर सामने आईं। तमाम बाधाएं दूर करने के बाद अब एक ही बड़ी समस्या रह गई है, पूरी जमीन पाने की। कुछ नेता किसानों को भ्रमित कर रहे हैं और उनके झूठे आश्वासनों में फंसकर किसान करार नहीं कर रहे हैं।
सिटी रिपोर्टर
बरेली। पिछले तीन महीनों में कुछ काम होता दिख रहा है लेकिन पुरानी दिक्कतों की वजह से प्रशासन बड़ा बाईपास के लिए जमीन के करार तेजी नहीं ला पा रहा है। अभी पांच सौ ज्यादा किसानों से करार होना रह गया है। इसकी मूल वजह किसानों का झूठे आश्वासनों पर भरोसा करना है। किसान भरोसा कर रहे हैं कि उन्हें रेट बढ़कर मिल जाएंगे, मगर ऐसा अब संभव नहीं लग रहा है।

परसाखेड़ा में जहां से बाईपास शुरू होगा, वहां के शुरू के तीन गांव परसाखेड़ा, धंतिया और टियूलिया में अब तक जमीन का मूल्य भी तय नहीं हो सका है। इसकी वजह है कि ये गांव एक तो नगर निगम सीमा में हैं और दूसरा इंडस्ट्रियल इलाके से सटे होने के कारण जमीन महंगी है। इस समय वहां का सर्किल रेट 92 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर है। जबकि बाकी गांव में जिला प्रशासन 25 लाख रुपये हेक्टेयर के हिसाब से ही जमीन का अधिग्रहण कर रहा है। टियूलिया के रहने वाले और पूर्व सांसद संतोष गंगवार के रिश्तेदार अरविंद कुमार सिंह ने बड़ा बाईपास में आने वाले गांवों के किसानों के नेता के रूप में कई आंदोलन चलाए। उन्होंने इन तीन गांव की जमीन के अलग भाव तय करने को कहा। इस पर तत्कालीन डीएम सुभाष चंद्र शर्मा ने मूल्य तय करने को अलग से सर्वे कराने को कह दिया। अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि प्रशासन सर्किल रेट के 60 प्रतिशत के हिसाब से भुगतान करना चाहता था, जबकि हम पूरी रकम मांग रहे हैं। अब रणनीति यही बनी हुई है कि बाकी गांव में अधिग्रहण का काम निपटने के बाद ही इन गांव को छुआ जाएगा। टियूलिया ही ऐसा गांव है, जहां के सबसे ज्यादा 250 किसानों की जमीन अधिग्रहित होना है। इनके अलावा कचौली, हमीरपुर, परधौली, बिवियापुर, अटाकायस्थान, दीदारपट्टी, भूड़ा और सैदपुर चुन्नीलाल में किसानों के साथ करार में गति बहुत हल्की है। वहां के किसान भी झूठे आश्वासनों में फंसे हुए हैं। आसपुर खूबचंद, अहलादपुर, वलीपुर अहमदपुर, पूरनापुर और फरीदपुर इनायत खां में मिल गई है पूरी जमीन।
इसलिए लटके हैं करार
1. सरकार के छह गुना मुआवजे के आश्वासन ने बनाया असमंजस
2. कोर्ट में दायर तीन याचिकाओं को लेकर भी बनाया जा रहा भ्रम
3. खेत में पड़ने वाले बोरिंग आदि का मुआवजा भी मांग रहे हैं
4- यह भी भ्रम है कि मुआवजा प्राइवेट कंपनी से मिलना है सरकार से नहीं।

कचौली का हाल
सात-आठ गांव ऐसे हैं, जहां रोजाना ही वहां के किसान आपस में बैठकर जमीन के लिए करार करने या न करने पर मंत्रणा करते हैं। कचौली में ‘पंचायत’ चल रही थी। यहां अभी एक भी किसान ने करार नहीं किया है। यहां के किसानों के नेता बने सुरेंद्र कुमार बोले, जमीन तो हम देने को तैयार हैं, मगर पूरा मुआवजा छह गुना लेंगे, अखिलेश जी ने ही तो घोषणा की थी। आगे कहा कि अब हम प्रशासन से बात नहीं करेंगे, बल्कि कंपनी वालों से बात करेंगे। इंद्रपाल बोले, मेरी तो पूरी तीन बीघा जमीन बाईपास में चली जाएगी तो क्या रोजगार करुंगा।


पेंच फंसाने से सौ करोड़ बढ़ गई लागत
बड़ा बाईपास सालों से लटका होने के कारण सौ करोड़ रुपये महंगा बैठेगा। एक बार जो पेंच फंसा तो यह सालों लटक गया और फिर जमीन की कीमत बढ़ती चली गई। सरकार को जो जमीन कुल 13 करोड़ में मिलनी थी, वह आज की तारीख में 63 करोड़ की पड़ेगी। वहीं निर्माण कार्य पर भी 50 करोड़ अधिक का खर्चा आएगा। दिसंबर 2003 में उत्तर प्रदेश राज्य भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 की धारा चार के तहत नोटिफिकेशन हुआ था। वर्ष 2006-07 में 80 प्रतिशत मुआवजे का भुगतान करने के बाद फाइनल तौर पर रकम देने में रकम आड़े आ गई। तब यह काम देख रही पीडब्ल्यूडी की नेशनल हाईवे विंग की मांग पर अब कहीं जाकर भूतल परिवहन मंत्रालय ने 13 सितंबर 2010 को मंत्रालय ने 13.59 करोड़ रुपये का भुगतान किया। इसके बाद बाईपास एनएचएआई (नेशनल हाईवे अथॉरिटी) के फोरलेन प्रोजेक्ट में शामिल होने के कारण तत्कालीन डीएम सुभाष चंद्र शर्मा ने यूपी के एक्ट के बजाए नेशनल हाईवे एक्ट के जरिए किसानों को ज्यादा फायदा दिलाने को पैरवी की। ऐसा हुआ तो नहीं, मगर शासन से जवाब आने में ही काफी समय बीत गया। इसके बाद सुभाष चंद्र शर्मा ने ही अधिग्रहण अधिनियम की धारा 11 के बजाए करार नियमावली 1997 के जरिए फाइनल भुगतान कराना तय कर लिया। अब इसी के तहत कार्रवाई चल रही है।

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