नगर निगम के आधे-अधूरे इंतजाम पड़े ठंड में भारी

Bareilly Updated Sun, 23 Dec 2012 05:31 AM IST
बरेली। स्टोर मेें जमा थोड़ी सी लकड़ी पर भरोसा कर रहे नगर निगम की लापरवाही ठंड में लोगों पर भारी पड़ गई है। बाहर से अब तक लकड़ी की खरीद न होने के कारण अफसर पिछले दो दिन में कड़क की ठंड पड़ने के बावजूद अलाव के स्थान नहीं बढ़ा पाया। फिलहाल जो 18 स्थान निश्चित हैं, वहां भी खानापूरी को ही लकड़ी डाली जा रही है। कंबल की भी अब तक खरीद नहीं होने से सभासदों में इस ठंड के बावजूद उबाल आ गया है।
ठंड शुरू होने पर समय से अलाव जल जाएं, इसके लिए लकड़ी खरीदने को महीने भर से कवायद चल रही है। इसके बावजूद लकड़ी नहीं खरीदी जा सकी है। अफसर टेंडर प्रक्रिया में ही उलझे रह गए। सस्ती लकड़ी खरीदने को कमेटी भी बनी, मगर उसका नतीजा भी सिफर रहा। इस पर भरोसा किया गया कि बाहर से लकड़ी खरीदकर आने तक स्टोर में जमा लकड़ी का सात-आठ दिन तो इस्तेमाल कर ही लिया जाएगा। अब जब दस दिन गुजर गए तो सभी अलाव में लकड़ी की मात्रा घटा दी गई है। एक-दो जगह को छोड़कर दस-दस या बारह-बारह किलो लकड़ी ही डाली जा रही है, जो तीन-चार घंटे से ज्यादा के लिए नहीं है। कहीं-कहीं किसी-किसी दिन ही लकड़ी डाली जा रही है। इन्हीं अव्यवस्थाओं को जानने के लिए ‘अमर उजाला’ की टीम ने जायजा लिया तो यह तस्वीर सामने आई। कुछ ऐसे भी स्थान नजर आए, जहां रात को काफी भीड़भाड़ थी, मगर अब तक वहां अलाव की व्यवस्था नहीं हो सकी है।
1. सेटेलाइट बस स्टैंड-यहां एक जगह लकड़ी जलती हुई दिखी। रिक्शा चालकों, यात्रियों और वेंडरों ने इसे घेर रखा था। पूछने पर बताया कि लकड़ी पड़ती तो है, मगर इतनी नहीं कि पूरी रात निकाल दे।
2. सैलानी चौराहा-इस जगह के बारे में शहर के सभी लोग जानते ही हैं कि हमेशा देर रात तक यह गुलजार रहती है। अलाव भी यहां हर साल लगता है, मगर इस बार अब तक व्यवस्था नहीं हो सकी है। लोगबाग यहां अंगीठी का ही सहारा ले रहे थे। रिक्शा चालक रहीम व दूसरे बुजुर्ग सिमटकर किनारे बैठ गए थे।
3. शहदाना चौराहा-एक किनारे अंडे का ठेला लगाए दुर्गा के मुताबिक यहां एक दिन लकड़ी पड़ती है तो दूसरे दिन नहीं। शनिवार को यहां अलाव गायब था।
4. रोडवेज बस स्टैंड-यहां सन्नाटे में अलाव जलाया जा रहा है। किसी यात्री की निगाह में आने वाला ही नहीं। टीम को भी बहुत ढूंढने के बाद दिखाई पड़ा। हालांकि यहां लकड़ी पर्याप्त थी।
5. कोहाड़ापीर-पेट्रोल पंप तिराहा पर पिकेट ड्यूटी के सिपाहियों के पांव के पास जरा सी लकड़ी जलती हुई पाई गई। सिपाहियों ने बताया कि दस-बारह किलो ही डाल जाते हैं नगर निगम वाले। चौपला चौराहा पर ऐसा ही हाल था, मानो लोगों ने कूड़ा-करकट इकट्ठा करके इंतजाम किया हो।

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शेल्टर होम भी मकसद से रह गए अधूरे
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बने शेल्टर होम का मकसद पूरा नहीं हो पा रहा है। एक तो सभी सात शेल्टर होम शहर के बीचोबीच से दूर हैं। आखिर गरीब कैसे वहां तक पहुंचे। एक-दो में कटिया से जरूर बिजली जल रही है, बाकी में वह भी नहीं। अभी कहीं बिजली कनेक्शन नहीं हो सका है। बदायूं रोड पर सुभाषनगर की पानी की टंकी के सामने बने शेल्टर होम पर कुछ ऐसा लिखा तक नहीं गया है, जिससे लोगों को पता लग सके। यही कारण है कि वहां अब तक कोई ठहरने नहीं पहुंचा है। शनिवार को चौकीदार ताला डालकर अंदर बैठा हुआ मिला, शायद यह उसकी मजबूरी भी थी। अब कोई पहुंचे भी तो ताला देखकर लौट जाएगा। ज्यादातर शेल्टर होम मुख्य सड़क से अंदर ही बने हैं, बाहर सड़क पर कोई बोर्ड न लगे होने से इनका प्रचार भी नहीं हो पाया है। हजियापुर में कई लोगों के ठहरे होने का कारण यह है कि मजदूरों ने इसे सोने का अड्डा बना लिया है, न कि किसी बेसहारा को यहां आश्रय मिल रहा है।

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