मनरेगा की ‘मार’ से किसान बेहाल

Bareilly Updated Sun, 09 Dec 2012 05:30 AM IST
बरेली। मनरेगा के चलते मजदूरी की रेट चढ़ जाने से दिक्कत महसूस कर रहे किसान इस स्कीम की वजह से एक और मुसीबत में फंस गए हैं। चकरोड बनाने के लिए उनके खेत से डेढ़ से दो फिट तक मिट्टी उठाई जा रही है, वो भी उनकी बिना रजामंदी के। शिकायत लेकर हाकिमों के पास जा रहे हैं, तो इसे नियम बताते हुए वे आंखें तरेर रहे हैं। अब यह दीगर बात है कि यह नियम किसी भी कानून की किताब में दर्ज नहीं है। इसलिए किसान भी मुंहजबानी कही बात को नियम मानने को तैयार नहीं हैं।
नवाबगंज के गांव त्यार जागीर के किसान छोटे लाल के खेत के किनारे इन दिनों चकरोड बनाया जा रहा है। शनिवार की सुबह मनरेगा का काम कर रहे मजदूर उनके खेत से भी मिट्टी उठाने पहुंच गए। चूंकि इसकी आशंका उन्हें पहले से थी, सो एक दिन पहले ही पूरी बात डीएम को बता दी थी। लेखपाल ने मौके पर पैमाइश की तो पाया कि चकरोड की सीमा से छोटे लाल के खेत की मेड़ कुछ फासले पर है। इसके बावजूद मनेरगा का काम कराने वालों ने उनके खेत से मिट्टी उठाने की बात कही। छोटे लाल ने विरोध किया तो उन्हें बताया गया कि जहां भी चकरोड बनता है, दोनों ओर के खेतों से एक-एक मीटर चौड़ाई में डेढ़ से दो फिट गहरी मिट्टी उठाई जाती है। इसलिए उन्हें भी मिट्टी दी जाएगी। जब वहां मौजूद सरकारी कर्मचारियों और प्रधान से इस बाबत कथित ‘लिखित नियम’ मांगा गया तो वे कुछ भी नहीं दिखा पाए। अलबत्ता विरोध के चलते काम जरूर रोक देना पड़ा।
यह समस्या छोटे लाल की ही नहीं है। तमाम गांवों से इसी तरह की शिकायतें आ रही हैं। प्रधान संघ के अध्यक्ष नियाज अहमद ने भी इसे स्वीकार किया। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, मिट्टी की ऊपरी छह इंच (आधा फुट) की परत ही उपजाऊ होती है, अगर यही ही उठा ली गई तो किसानों को काफी आर्थिक नुकसान होगा।


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चारों के फोटो ---
मेरे घर से प्रधानी ही चली गई
मेरे पिता हेतराम साहू पिछली बार प्रधान चुने गए थे। उनके कार्यकाल में तमाम चकरोड बनाए गए। मिट्टी किसानों के खेतों से ही उठाई गई, उनके विरोध के बावजूद। इसी का नतीजा हुआ कि लोग खिलाफ हो गए और इस बार हम हार गए।-रामस्वरूप, पीपलसाना (भोजीपुरा)


चकरोड न बनवाने का फैसला लिया
किसानों की इच्छा के बिना उनके खेत से चकरोड के लिए मिट्टी नहीं उठाई जा सकती। जहां भी ऐसा हो रहा है, गलत है। हमारे गांव के किसान मिट्टी देने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए हमने मनरेगा से अभी तक एक भी चकरोड नहीं बनवाया है।-सतपाल पटेल, प्रधान, धौरेरा चावड़


कार्रवाई की धमकी देते हैं कर्मचारी
मनरेगा के तहत चकरोड बनवाने का नियम तो है, मगर मिट्टी किसानों के यहां से ही ली जाती है। अगर किसान उपजाऊपन खत्म होने की वजह से मिट्टी देने से इनकार करते हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की धमकी भी सरकारी मुलाजिम देते हैं।-संजीव कुमार, परसू नगला


सरासर नाइंसाफी है यह
हमारे गांव में भी चकरोड बना तो खेत से मिट्टी उठाई गई। जिन किसानों ने चकरोड काटा भी नहीं था, उनके खेत से भी मिट्टी उठाई गई। यह तो सरासर नाइंसाफी है, लेकिन उनके पक्ष में आवाज उठाने वाला कोई नहीं।-महेंद्र पाल, किसान, कुआटांडा
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चकरोड बनाने के लिए मिट्टी कहीं और से लाने के लिए कोई बजट नहीं होता। इसलिए आप ही बताइए कि हम कहां से मिट्टी लाएं। चकरोड के दोनों तरफ के किसानों को ही यह मिट्टी देनी होती है। बाद में किसान खेत को खुद ही समतल कर लेते हैं। हां, यह सही है कि उनके खेत से ही मिट्टी लेने नियम कहीं दर्ज नहीं है।-रामनरेश, परियोजना निदेशक, जिला ग्राम्य विकास अभिकरण

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