हर साहिबे निसाब पर वाजिब है कुर्बानी

Bareilly Updated Thu, 25 Oct 2012 12:00 PM IST
बरेली। ईद पर कुर्बानी करना हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है। खुदा ने इस मौके पर कुर्बानी करना हर उस मुस्लिम मर्द, औरत, आकिल, बालिग और मुकीम पर फर्ज है, जिसके पास सात तोले सोना या साढ़े बावन तोला चांदी या इसके बराबर मालियत हो। अपने रब को राजी करने के लिए अपनी जान माल ही नहीं औलाद को भी कुर्बान करने से परहेज नहीं करना चाहिए।
एक मरतबा हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ख्वाब में देखा कि वह अपने बेटे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम को जिबाह कर रहे हैं। इसी ख्वाब को अल्लाह का हुक्म जानकर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम बेटे को जिबह करने के लिए ले गए। उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। ताकि बेटे की मोहब्बत न जाग जाए। अल्लाह की राह में उन्होंने बेटे को कुर्बान करने के लिए जैसे ही उनकी गर्दन पर छुरी चलाई। अल्लाह के हुक्म से फरिश्ते हजरत जिब्राईल ने हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह दुम्बा रख दिया। उनकी जगह दुम्बा जिबह हो गया। हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की यह अदा अल्लाह को इतनी पसंद आई कि उन्होंने कुर्बानी को प्यारे रसूल हजरत मोहम्मद सल्लाहो अलैहिवसल्लम की उम्मत पर वाजिब कर दिया।
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तीन दिन होगी कुर्बानी
-जिलहिज्जा की दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं तारीख यानी 27, 28 और 29 अक्तूबर को तीन दिन कुर्बानी की जा सकती है। हदीस शरीफ में कहा गया है कि पहले दिन कुर्बानी करना ज्यादा अफजल है। पांच साल उम्र के ऊंट, दो साल की भैंस, एक साल के बकरे और एक साल ही उम्र के दुम्बा व भेड़ की भी कुर्बानी की जायज है। बकरे की कुर्बानी एक शख्स की तरफ से हो सकती है। जबकि भैंस और ऊंट में सात लोग हिस्सा कर सकते हैं। अंधे, काने, लंगड़े जानवर की कुर्बानी जायज नहीं है।

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ईद की नमाज के बाद करें कुर्बानी
-जिन शहरों और बस्तियों में नमाजे जुमा और ईदैन जायज है। वहां नमाज के पहले कुर्बानी करना जायज नहीं है। बरेली हज कमेटी के मीडिया प्रभारी नासिर कुरैशी ने बताया कि जिस शख्स ने ईद की नमाज से पहले कुर्बानी कर ली, उसको दोबारा करना लाजिम है। जिन छोटे गांव में नमाजे ईद और जुमा नहीं होता वहां दसवीं तारीख यानी ईद के दिन सुबह सादिक में भी कुर्बानी की जा सकती है।
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हज का दूसरा दिन
बरेली के 2500 लोग आज बनेंगे हाजी
-अराफात के मैदान में कयाम है हज का असल रुकन

बरेली। गुरुवार को बरेली के 2500 लोग आराफात के मैदान में कयाम करते ही हाजी बन जाएंगे। आराफात के मैदान में कयाम (रुकना) ही हज का असल रुकन है। इस मैदान में जिस वक्त भी आप पहुंच गए और मगरिब की अंजान से पहले निकल गए तो हज खारिज हो जाएगा। इसलिए मगरिब की अंजान के बाद ही सब लोग इस मैदान से निकलकर मुज्जलफा के मैदान में जाकर हाजी नमाज अदा करते हैं।
शहर के मोहल्ला जखीरा के रियाज अहमद ने मिना के मैदान से फोन पर बताया कि उनका हर पल इबादत में गुजर रहा है। गुरुवार को सुबह फज्र की नमाज के बाद हम लब्बैक कहते हुए अराफात के मैदान की तरफ कूंच कर जाएंगे। वहां नीम के हरे भरे पेड़ों के नीचे बेहद सुकून मिलता है। यहां मस्जिदे नुमरा है, जिसमें 10 लाख लोग एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं। यहीं पर स्पीकर से जरिए हज का खुतबा पढ़ा जाता है। अपने -अपने खेमों में आजमीने हज खुतबा सुनते हैं। स्वालेनगर निवासी ऐहतशाम का कहना है कि खास बात यह है कि मस्जिदे नुमरा का 40 फीसदी हिस्सा आराफात के मैदान से खारिज है। लिहाजा गुरुवार को नमाजों और खुतबे के बाद हाजियों को खारिजी हिस्से से अराफात के हुदूूद के आ जाना लाजिमी है। उनका कहना है कि यौमे हज पर उनकी सालों पुरानी मुराद पूरी हो जाएगी। बरेली हज कमेटी के उपाध्यक्ष मोहम्मद यासीन कुरैशी ने बताया कि हज के दिन अराफात के मैदान में मांगी गई हर दुआ कु बूल होती है। इसलिए इस मुबारक दिन में दुआएं मांगते रहें।

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