सलाखों के पीछे बेहाल बचपन

Bareilly Updated Thu, 04 Oct 2012 12:00 PM IST
नीरज सिंह
बरेली। पढ़ने-लिखने, दोस्तों के साथ खेलने-कूदने और संस्कारों के सीखने की उम्र में आठ ऐसे मासूम हैं, जिनके सपने जेल की चहारदीवारी में कैद होकर रह गए हैं। हत्या, दहेज हत्या, अपहरण और मारपीट जैसे मामलों में जिला जेल की सलाखों के पीछे सजा काट रहीं अपनी माताओं के साथ ये मासूम भी बंदी का जीवन जीने को मजबूर हैं।
चार माह का शिवांश मां वर्षा निवासी क्योलड़िया के साथ, दो वर्ष का फैजान मां आमना बेगम निवासी भूरे खां गौटिया इज्जतनगर के साथ, पांच माह का सचिन मां माया निवासी नवादाबंद फरीदपुर के साथ, डेढ़ साल का पुष्पेंद्र मां मुन्नी देवी निवासी सिमरा फतेहगंज पूर्वी के साथ, ढाई साल का मुन्ना व पांच साल की शुकिया मां अन्नू निवासी महेशपुरा सुभाषनगर के साथ, तीन साल की शबाना मां सीमा निवासी हुसैन बाग किला के साथ और पांच माह का शाहिद मां रुकसाना निवासी बैरमनगर शेरगढ़ के साथ जिला जेल में बंद हैं। इनमें से फतेहगंज की मुन्नी को पति की हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा हो चुकी है। बाकी अन्य महिलाओं के मुकदमे कोर्ट में विचाराधीन है। हालत यह है कि इन बच्चों को खूंखार अपराधियों के बीच मां से ककहरा सीखना पड़ रहा है।
टीचर ने नए सत्र से आना किया बंद
बच्चों में पांच साल की शुकिया और तीन साल की शबाना पढ़ने योग्य हो गई हैं। इसके बावजूद जेल में किसी टीचर की तैनाती नहीं की गई। पहले इन बच्चों के न होने से नए सत्र से महिला टीचर का आना बंद हो गया था। अब इनको ‘एक पढ़ाए एक’ की तर्ज पर जेल में बंद शिक्षित महिलाओं से पढ़वाने का प्रयास किया जा रहा है। बाकी इन बच्चों के दूध और भोजन की व्यवस्था जेल में अलग से की गई है। खेलने के लिए खिलौने भी मिल रहे हैं, लेकिन माहौल मिला तो वो भी कैदियों से भरे जेल का।
यह है नियम
जेल में बंद किसी महिला का बच्चा यदि छह साल से कम उम्र का है तो वह अपनी मां के साथ रह सकता है। छह साल होने के बाद कोर्ट के आदेश पर बच्चे को अन्य परिजनों को सौंप दिया जाता है। यदि बच्चे को कोई परिजन नहीं है तो जिला प्रोवेशन अधिकारी को अभिभावक की भूमिका निभाते हुए उसके रहने-खाने के साथ पढ़ने की व्यवस्था करनी होती है।
वर्जन
सात महिलाओं के आठ बच्चों को सारी सुविधाएं दी जा रही हैं। सुरक्षा की दृष्टि से लड़कियों का प्रवेश बाहर के स्कूल में नहीं कराया गया। जेल में बंद शिक्षित महिलाओं के जरिए बच्चियों को कापी-किताब देकर पढ़ाया जा रहा है। एक महिला टीचर की तैनाती के लिए डीएम को पत्र भेजा जा रहा है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत सभी बंदियों को शिक्षित करने का प्रयास भी जारी है।
आरके मिश्र, जेल अधीक्षक जिला कारागार

बच्चों पर नकारात्मक होगा प्रभाव
मां के साथ जेल में रह रहे बच्चों के प्रारंभिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। मानसिक विकास बाधित होने के साथ वे आगे चलकर कभी भी मनोवैज्ञानिक रूप से पीड़ित हो सकते हैं। इससे बचने के लिए उन्हें बाहरी वातावरण से बराबर जुड़ा रखना होगा। ऐसा न होने से वे उदासीन होकर समाज विरोधी व्यवहार में संलिप्त हो सकते हैं। व्यवहारिक ज्ञान प्रभावित होने से उनके व्यक्तित्व पर उल्टा असर पड़ सकता है।
- डॉ. सुविधा शर्मा, वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक

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