अफसर नहीं चाहते चालू हो पराग फैक्ट्री!

Bareilly Updated Fri, 07 Sep 2012 12:00 PM IST
1996-97 में हुए 52.28 लाख के गबन की फाइल खुलने का खौफ
शासन को भेज दी दूध न मिल पाने की रिपोर्ट
फिर चालू करने के लिए चाहिए 4.70 करोड़

बरेली। पराग दुग्ध फैक्ट्री को फिर से चालू करने की बातें तो खूब हो रही हैं मगर हकीकत यह है कि विभाग के अफसर ही इसे चालू होने देना नहीं चाहते। दरअसल उन्हें फैक्ट्री चालू होने पर पुराने घोटालों की फाइलें खुलने का डर है। लिहाजा उन्होंने शासन को निगेटिव रिपोर्ट भेज दी।
करगैना स्थित पराग दुग्ध फैक्ट्री में फरवरी 2010 से तालाबंदी है। इसे दोबारा चालू करने का मामला कई बार शासन स्तर तक उठ चुका है। सपा सरकार बनने पर आगरा, मथुरा और फतेहपुर की बंद फैक्ट्री चालू हो गईं। हालांकि यहां बकाया की रकम भी दूसरी जगहों से बहुत कम है। आगरा में तो 7.84 करोड़ की देनदारियां थीं जबकि बरेली में सिर्फ 4.16 करोड़ की हैं। इन देनदारियों समेत बाकी इंतजामों के साथ 4.70 करोड़ रुपये चाहिए। बरेली की फैक्ट्री के चालू न होने के पीछे अफसरों को ही बड़ी वजह बताया जा रहा है। दरअसल अफसरों को डर है कि यदि फैक्ट्री चालू होगी तो घोटालों की पुरानी फाइलें भी खुल जाएंगी। यहां सबसे बड़ा घोटाला 1996-97 में 52.28 लाख रुपये के गबन हुआ। कुल मिलाकर करीब एक करोड़ की आर्थिक गड़बड़ियां आडिट रिपोर्ट में शामिल की गई थीं। तब सामान्य प्रबंधक भीम प्रकाश थे, जो अब यहां के क्षेत्रीय दुग्धशाला विकास अधिकारी हैं। भीम प्रकाश के बारे में अपर दुग्ध आयुक्त पुष्पा सिंह ने लिखा भी है कि वह जानबूझकर ऑडिट की आपत्तियों को दूर नहीं कर रहे हैं और न ही कोई जवाब दे रहे हैं।
यह लिखा गया है रिपोर्ट में
फैक्ट्री को दोबारा चालू करने में वित्तीय कठिनाइयां आ रही हैं। शाहजहांपुर के निकटवर्ती क्षेत्र फरीदपुर और फतेहगंज पूर्वी में गठित दुग्ध समितियों से शाहजहांपुर के दुग्ध संघ द्वारा सीधे दूध खरीदा जा रहा है। रिपोर्ट में यह जाहिर करने की कोशिश की गई है कि यदि फैक्ट्री चालू होती है तो उसे दूध मिलना मुश्किल होगा। जबकि असलियत यह है कि फरीदपुर और फतेहगंज पूर्वी में दुग्ध समितियां बनी ही नहीं हैं।

कर्मचारियों के घरों के हालात बिगड़े
फैक्ट्री के 108 कर्मचारियों को फरवरी 2009 से वेतन नहीं मिला है। कर्मचारी एक-एक पैसे को मोहताज हैं। आर्थिक तंगी से परेशान होकर जागृतिनगर, करगैना के ओमप्रकाश ने एक महीना पहले आत्महत्या कर ली। गणेशनगर के बागेश कुमार की तीन महीने पहले बीमारी का इलाज न करा पाने की वजह से मृत्यु हो गई।

फोटो-
मेरे पति ओमप्रकाश की वर्ष 1994 में नौकरी लगी थी। कहीं कोई दिक्कत नहीं थी। फरवरी 2009 से तनख्वाह मिलना बंद हो गई। घर की हालत बिगड़ी तो पति ने लोन लेकर टेंपो लेे लिया। 55 हजार रुपये का कर्ज और हो गया। इससे तंग आकर 17 जुलाई को पति ने फांसी लगा ली। अब चार बच्चों का खर्चा कैसे करें हम। -मायादेवी।

फोटो-
मैं चालक के पद पर कार्यरत था। फैक्ट्री बंद होने से घर के हालात बिगड़ गए हैं। ऐसा धक्का लगा कि मैं पैरालाइसिस का शिकार हो गया। इलाज में काफी खर्चा हुआ लेकिन फिर चलने-फिरने लायक नहीं हो पाया हूं। इकलौते बेटे मनीष सिंह की बीटेक की पढ़ाई छूट गई। अब वह कोचिंग करके घर का खर्चा चला रहा है।-शेर सिंह

क्षेत्रीय दुग्धशाला विकास अधिकारी भीम प्रकाश ने ही यहां से गलत रिपोर्ट भेजी है। दरअसल वह पहले यहां सामान्य प्रबंधक थे। उनके ही कार्यकाल में गबन का सबसे बड़ा मामला हुआ था। गलत रिपोर्ट भेजने के साक्ष्य भी हैं।-अमर सिंह, मंत्री मजदूर संघ

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