प्रसंगवशः कर्फ्यू के दिन, वो फसादों की रातें

Bareilly Updated Fri, 03 Aug 2012 12:00 PM IST
जिंदगी कभी ठहरती नहीं है। कर्फ्यू आप को चलने नहीं देता। फसाद के दिनों में अपने समाज में यह कशमकश अक्सर होती है। वक्त बेवक्त की अपनी जरूरतों-जवाबदेहियों और कानूनी फरमान के बीच आदमी झूलता रहता है, ‘अनारकली’ और ‘मुग़ले आज़म’ की तरह। पिछले दस दिनों से बरेली और पड़ोस के आंवला में ऐसा इत्तफाक बार-बार हो जा रहा है। हालांकि अमनपसंद लोग रहते हैं यहां, लेकिन किन्हीं वजहों से अब आकर यहां भी कुछ नाइत्तफाकियां कभी-कभी हो जाती हैं। ये हालात, दूसरी सारी मुश्किलों-मुसीबतों के साथ आदमी के मान-सम्मान पर भारी पड़ने लगते हैं। कर्फ्यू का पालन कराने वाला तंत्र मियाद के अंदर किसी तरह की रियायत नहीं देता, जबकि कुछ लोग मजबूर होते हैं कि उनको कहीं जाना ही है। फिर तो ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले.. ’ की नौबत होती है। बेआबरू सिर्फ गली-कूचे में नहीं चौराहों तक पर होना पड़ता है। पुलिस की मर्जी पर है कि आप को कब, कहां मुर्गा बना दे। इस बार के उपद्रव के शुरू के तीन-चार दिनों में तो मुर्गा बनाने का रोना रोते बहुत लोग दिखे। वैसे ऐसे दिनों में किसी को मुर्गा बनाना पुलिस का तो मानो खेल हो जाता है। इस बार ऐसे भी उलाहने दिए गए कि पुलिस वालों, उनके या प्रशासन के किसी अफसर ने भी कुछ मीडियावालों से अंताक्षरी खेलने के लहजे में कहा, ‘आप तो रोज ही खबरों में हमें हवाई जहाज बनाते हैं, आज वक्त है तो हम मुर्गा ही बना देते हैं।’ हालांकि कहने वाले ने ऐसा मज़ाक में कहा हो तो ज्यादा अच्छा है। हम मानते हैं कि यह मजाक ही होगा। शहर के आम लोगों का कहना होता है कि अपने देसी समाज में आपसी रिश्ते बहुत फैले होते हैं और हम अपने परिवार, अपनी संतानों, दोस्तों, रिश्तेदारों पर काफी पक्के भरोसे के साथ जुड़े होते हैं। उनके अच्छे-बुरों दिनों में हमें किसी भी वक्त, चाहे कर्फ्यू हो तो भी, उनके साथ, उनके बीच होना पड़ता है। उनके तकाजे पूरे किए बिना हम खुद भी चैन से नहीं रह सकते। यह हमारी जातीं पहचान है। हमारा आग्रह यह भी होता है कि सभ्य समाज में शासन, सरकार और उसके नुमाइंदे कानून का सम्मान करते हुए कानून की मंशा का भी निरादर न करें। और, कानून की मंशा तो बेशक है कि आम नागरिक की खुद्दारी, उसके मान की परवाह की जाए। तंत्र- प्रशासन और पुलिस उसका आदर करे। सवाल है कि हम आइडियल होने के लिए कितना कुछ करने का हौसला रखते हैं। वरना तो मुर्गा बनाइए, मुर्गा लड़ाइये, चाहे हलाल कर दीजिए.. आप तो अपने मन के लॉट साहब हैं न।

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