फख्र है बेटा देश के काम आया

Bareilly Updated Sun, 08 Jul 2012 12:00 PM IST
कारगिल के शहीद रंजीत सिंह की पुण्यतिथि आज
रिटायर्ड फौजी कालीचरन ने कहा- सरकारी रवैये पर अफसोस
नीरज
बरेली। बेटे को याद करते ही आंखें नम हो जाती हैं। इसके बावजूद उन्हें इस बात का फख्र है कि वह वीर सपूत था और देश के काम आया। शुरू से इच्छा थी बेटा नाम रोशन करे, जो उसने कर दिखाया। दो बेटे और हैं, जो सेना में रहकर देश की सेवा कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर यदि वह भी देश के काम आ जाए तो गम नहीं। यह कहना है कारगिल में शहीद हुए रंजीत सिंह के पिता कालीचरन सिंह का।
बिथरी चैनपुर के नरियावल गांव में रहने वाले रिटायर्ड फौजी काली चरन सिंह के चार बेटे थे। एक बेटा घर पर रहकर खेती किसानी करता है, जब कि तीन सेना में थे। अब दो ही बचे हैं। सब से छोटा बेटा रंजीत सिंह 16 गढ़वाल रायफल रेजीमेंट में सिपाही था। 2002 में कारगिल में हुए ‘आपरेशन पराक्रम’ में रंजीत सिंह ने दुश्मनों से लोहा लिया। आठ जुलाई 2002 को कारगिल से ऊपर की पहाड़ी शैडिल पोस्ट पर तैनाती के दौरान वह दुश्मनों की तोप के शिकार हो गए। यह खबर जब गांव में पहुंची तो लोग शोक में डूब गये। तीन दिन बाद शहीद रंजीत का शव तिरंगे में लपेट कर गांव में लाया गया तो हर किसी का सिर फख्र से ऊंचा था। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए लोगों का तांता लग गया। शहीद की अंतिम यात्रा में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए। उस समय शहीद रंजीत के नाम पर स्मारक बनवाने के साथ ही परिवार के लोगों को तमाम तरह की सुविधाएं देने के वादे किये गए लेकिन समय के साथ सभी वादे धूमिल हो गए। आज सिर्फ नरियावल के लोगों को ही याद है कि उनके बीच से निकला जांबाज देश के काम आया।

नहीं बना गांव में शहीद द्वार
11 जुलाई 2002 को शहीद रंजीत की अंतिम यात्रा में शामिल हुए जनप्रतिनिधियों ने वादा किया था कि गांव में उनके नाम पर द्वार बनेगा। ग्रामीण भी चाहते हैं कि वीर सपूत की याद में स्मारक बनाया जाए लेकिन दस साल बाद भी प्रशासनिक तौर पर कुछ नहीं किया गया। इसके अलावा पेट्रोलियम मंत्रालय ने भी पेट्रोल पंप दिलाने का आश्वासन दिया था, वह भी कागजों तक सिमट कर रह गया।

इच्छा मृत्यु की मांग कर चुकी हैं मां
शहीद रंजीत सिंह की मां बिरजा देवी की आंखों में बेटे के लिए सम्मान है। वह खुद को धन्य मानती हैं। हर रोज वह खुद की जमीन पर बनाए गए बेटे की समाधि पर जाती हैं। गांव के लोग भी समाधि पर मत्था टेकते हैं। इसके बावजूद बेटे के नाम को सरकारी तौर पर उचित सम्मान न मिलने से दुखी बिरजा देवी ने 12 अप्रैल 2010 को राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इच्छा मृत्यु की मांग की। इसे गंभीरता से लेते हुए महामहिम ने रक्षा मंत्रालय को शहीद को सम्मान देने के लिए आवश्यक दिशा निर्देश दिये लेकिन अब तक कुछ भी नहीं किया गया।

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