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आइटम सांग बुरे लेकिन हमारी मजबूरी हैं

Bareilly Updated Tue, 19 Jun 2012 12:00 PM IST
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बॉलीवुड को इशारों पर नचाने वाली सरोज खान बच्चों में शास्त्रीय नृत्य के प्रति अरुचि से व्यथित

सिटी रिपोर्टर
बरेली। उन पर बॉलीवुड का रंग कम ही चढ़ा है। सलीका और सौम्यता के साथ पेश आती हैं, बगैर कोई तड़क भड़क दिखाए। हर कोई उन्हें सरोज खान के नाम से जानता है। वह फिल्मी दुनिया की बेहतरीन कोरियोग्राफर हैं। श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित से लेकर ऐश्वर्या राय, करीना कपूर और अब कैटरीना कैफ को पर्दे पर अपने इशारों पर नचा कर करोड़ों दर्शकों को उनका दीवाना बनाने वाली सरोज खान फिल्मों में ‘आइटम सांग’ को गलत मानती हैं। बच्चों में शास्त्रीय नृत्य के प्रति घट रही ललक से भी वह व्यथित दिखीं।
ईश्वर ने सरोज खान को ऐसा हुनर दिया है कि उनके हर स्टेप पर तालियां बजती हैं। उन्होंने नृत्य की कभी ट्रेनिंग नहीं ली, लेकिन फिल्मों में नृत्य को उन्होंने जो ऊंचाई दी है, उसे बड़े-बड़े तालीमशुदा लोग भी नहीं कर पाएंगे। मंगलवार को कमांडो डांस ग्रुप की सप्ताह भर चलने वाली वर्कशॉप का उद्घाटन करने सरोज सोमवार को बरेली पहुंचीं। यह मशहूर कोरियोग्राफर बरेली क्लब में पत्रकारों से रू-ब-रू हुईं। फिल्म इंडस्ट्री में अब तक कोई दूसरी सरोज खान पैदा क्यों नहीं हो सकी? इस सवाल पर कहती हैं, ‘चलती गाड़ी में बोनट नहीं खोला जाता है। दुकान चल रही है तो चलने दो।’ यह उनका सीधा सा जवाब है, लेकिन सच यह है कि उनके जैसा हुनर वाला बॉलीवुड में कोई दूसरा पैदा ही नहीं हुआ।
सरोज खान माधुरी दीक्षित और गोविंदा को अपना खास शिष्य मानती हैं। वह कहती हैं, सुभाष घई की ‘विधाता’, ‘हीरो’ और संजय लीला भंसाली की ‘देवदास’, ‘सांवरिया’ जैसी फिल्में मील का पत्थर हैं। देवदास में डोला रे... गीत पर डांस की कोरियोग्राफी के लिए उन्हें रिकॉर्ड 17 पुरस्कार मिले, इसमें राष्ट्रीय पुरस्कार भी शामिल है। फिल्मों में आइटम सांग को वह बेहद खराब बताते हुए कहती हैं, ‘यह हमारी मजबूरी है या तो काम छोड़ दें या आइटम करते रहें। लेकिन उसमें भौंडापन ज्यादा आ गया है, इसे कम होना चाहिए।’ वह कहती हैं कि शास्त्रीय नृत्य को सीखने के प्रति नई पीढ़ी में कोई ललक नहीं दिखती। हर बच्चा हिपहॉप और जैज सीखना चाहता है। सभी नृत्य की पाश्चात्य शैली के दीवाने हैं।
इस मौकेे पर विजय कमांडो, गरिमा कमांडो, नजमा खान, संदीप अग्रवाल, निधि अग्रवाल, शुचि अग्रवाल, साकेत साकेत सुधांशु शर्मा और गौरव अग्रवाल मौजूद रहे।

इनसेट में
14 साल की उम्र में कर लिया था धर्म परिवर्तन
सरोज खान का वास्तविक नाम निर्मल किशन चंद सद्धू सिंह नागपाल है। 14 साल की उम्र में मुस्लिम धर्म अपनाने के बाद उन्हें नया नाम मिला। धर्म परिवर्तन के पीछे कारण बताते हुए सरोज खान बताती हैं कि उनकी दिवंगत बहन बार-बार उनके ख्वाब में आती थीं। उस ख्वाब में दरगाह और मस्जिद भी होती थीं। इस बारे में उन्होंने अपनी मां नोनी से बात कर मुसलमान बनने की इच्छा जाहिर की। काफी सोचविचार के बाद मां ने इस बात की इजाजत दे दी। आगे चलकर उन्होंने सरदार खान से विवाह किया। उनके बेटे राजू खान भी उन्हीं के नक्शेकदम पर हैं।

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