फिल्म के जुनून ने क्या-क्या नहीं कराया

Bareilly Updated Fri, 15 Jun 2012 12:00 PM IST
बायस्कोप........



विनय कुमार राय
बरेली। हम 9-10 बच्चे लालगंज तहसील में स्थित एक स्कूल में जाया करते थे। जो हमारे गांव से सात किलोमीटर की दूरी पर था। इस ग्रुप में सबसे बड़े मेेरे भाई और उसके बाद मैं था। उस समय मैं चौथी कक्षा में पढ़ रहा था। भैया अक्सर फिल्म देख लेते थे और आकर हम लोगों को फिल्म की स्टोरी सुनाया करते थे। इससे मेरे मन में भी फिल्म देखने की अच्छा जागती थी। लेकिन, चोरी से फिल्म देखना, मुझ जैसे लड़के के लिए बड़ी बात थी। ऊपर से एक समस्या यह भी थी कि स्कूल मैनेजर और हाल के मालिक एक ही थे। इसके चलते स्कूल यूनिफार्म में फिल्म देखने पर पकड़े जाने का भी डर था। मेरे भाई अक्सर फिल्म देखते थे, लेकिन उन्हें हमेशा डर होता था कि कहीं मैं घर पर न बता दूं। इसलिए, वह मुझे अक्सर फिल्म देखने के लिए प्रेरित करते थे। एक दिन सुबह ही आकर मेरे बड़े भाई साहब ने बताया कि अक्षय कुमार की ‘सौगंध’ जबरदस्त मारधाड़ वाली फिल्म लगी है। मेरा भी मन फिल्म देखने के लिए मचलने लगा।
सुबह से ही हम लोग फिल्म देखने की योजना बनाने लगे। इस योजना का पहला हिस्सा यह था कि आज ड्रेस पहनकर नहीं जाएंगे ताकि टॉकीज़ के कर्मचारी यह न जान सकें। दूसरा, चूंकि हम लोग सुबह नौ बजे से ही स्कूल पहुंच जाते हैं जबकि फिल्म का पहला शो 12 बजे शुरू होता है तो इन तीन घंटे हम लोग टॉकीज़ से दूरी बनाकर रहेंगे ताकि, कोई देख न ले। प्रवेश सभी लोगों के अंदर चले जाने के बाद करेंगे ताकि कोई देख न पाए। तीसरी समस्या सबसे विकट थी। वह थी टिकट के पैसे की व्यवस्था करना। उस समय हम लोगों को 50 पैसे पॉकेट मनी मिलती थी जबकि टिकट का मूल्य तीन रुपये पचास पैसा था। अब हमें कुल सात रुपये की जरूरत थी, जबकि हम दोनों लोगों के पास मात्र एक रुपया था। हम दोनों भाई निराश थे कि फिल्म नहीं देख पाएंगे, लेकिन तभी मुझे एक आइडिया आया। स्कूल के पास ही एक टॉफी-बिस्किट दे देती थी, जिस पर महिला बैठती थी। यह महिला मुझे उधार में भी टॉफी बिस्किट दे देती थी, जिसे अगले दिन मैं लौटा देता था। यह दुकान इस दिन मेरे बहुत काम आया। पैसा भी वहीं से उधार मिल गया। लेकिन, यह पैसा भी अगले ही दिन के वादे के साथ लिया था। लेकिन इन सबके दौरान हमेशा एक डर बना रहा कि कोई देख न ले, क्योंकि स्कूल, दुकान और हाल थोड़ी-थोड़ी दूरी पर एक ही रोड पर स्थिति थे। खैर, फिल्म तो देख ली, लेकिन, उधार लिए गए पैसे अगले ही दिन देने की चिंता मजे को किरकिरा कर रही थी। किसान परिवार से संबंध रखने की वजह से घर में अनाज बोरियां ढेर सारी पड़ी रहती थीं। योजना बनाई गई कि अनाज को अपने बैग में छिपा कर ले जाएंगे और उसे बेचकर उधार चुकता कर देंगे। बेचने के लिए चने का चयन किया गया, क्योंकि चना महंगा बिकता है, दूसरे इसकी चोरी आसान रहती। बैग में छिपाकर ले जाएंगे किसी को पता भी नहीं चलेगा। खैर, फिल्म के शौक के लिए यह अपराध भी कर डाला। इस घटना के चार-पांच साल बाद बाबू जी हम लोगों को अपने साथ पहली फिल्म (उनके अनुसार) दिखाने ले गए। लेकिन, अब तक तो हम दोनों भाई कई फिल्में देख चुके थे। लेकिन, बाबू जी के सामने ऐसा दिखावा करना पड़ा कि जैसे हम लोग पहली बार हाल में आए हैं।
(लेखक ऑडिटर, आर्मी हैं)

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