पहले हम परछाई बनकर रहते थे, अब अपनी परछाई से ही डरते हैं...

Barabanki Updated Mon, 17 Dec 2012 05:30 AM IST
रामनगर। लोधेश्वर महादेवा की पवित्र भूमि पर प्रति वर्ष आयोजित होने वाले महोत्सव में शनिवार की रात ओज, श्रंगार, हास्य और व्यंग्य के अलग-अलग रसों से सराबोर सरोवर में श्रोताओं ने आनंद के गोते लगाए। मौका था यहां आयोजित विराट काव्य समारोह का जहां सोम ठाकुर, जमुना प्रसाद उपाध्याय, डॉ. राहुल अवस्थी, लता शबनम और सबा बलरामपुरी जैसे देश के बड़े कवि एवं कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को पूरी रात बांधे रखा।
समारोह का प्रारंभ ग्राम्य विकास राज्यमंत्री अरविन्द सिंह गोप ने मां वीणा वादिनी के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्जवलन से किया। इसके बाद देश में ओज के बड़े नाम सोम ठाकुर ने मां सरस्वती की स्तुति को अपने शब्द व स्वर देते हुए पढ़ा- जयति-जयति हे शारदे गूंज कर वाणी अमर हो, शक्ति भर सत्यम मुखर हो, शब्द सर से शारदे, कर्ण कारण शिवम अगम भी सुगम हो। इसके उपरान्त देश के उभरते हुए हिन्दी के सशक्त हस्ताक्षर बरेली से आए प्रोफेसर डॉ. राहुल अवस्थी ने माइक थामा। उन्होंने हाजी वारिस अली और लोधेश्वर महादेवा की संगम स्थली बाराबंकी में समृद्ध सांप्रदायिक सौहार्द को समूचे देश में फैलाने का संदेश देती हुई रचना पढ़ी तो वहीं पड़ोसी जनपद में गत दिनों इस सौहार्द को कम करने की नापाक कोशिश पर उन्होंने अपना पक्ष कुछ इस तरह रखा कि- रिश्तों की गहराई से ही डरते हैं, भाई होकर भाई से ही डरते हैं, पहले हम परछाई बनकर रहते थे, अब अपनी परछाई से ही डरते हैं। उनकी इस रचना पर श्रोताओं की खूब वाहवाही मिली।
सतना मध्य प्रदेश से आये कवि रविशंकर चतुर्वेदी ने देश की दशा और दिशा को कुछ इस तरह से बयां किया- नमन है मेरे हिन्दुस्तान, नमन है मेरे हिन्दुस्तान, यहां कुछ भूखे पडे़ उतान, रहे कुछ हलुआ पूड़ी छान। इलाहाबाद के अखिलेश द्विवेदी ने अपने जज्बात कुछ इस तरह बयां किये- मोहब्बत के तराने जब लबों तक भी न आएंगे, वहां पर देशभक्ति के गीत कैसे गाएंगे। बाल कवि वंश दीक्षित ने वसंत पर अपनी कविता पाठ करते हुए कहा कि बसन्त राजा फूले तेरी फुलवारी, महक-महक महके खेतवा की क्यारी। फैजाबाद के विख्यात कवि जमुना प्रसाद उपाध्याय ने अपनी रचना में वर्तमान सामाजिक परिदृश्य को शब्दों में ढालकर जब पढ़ा तो समूचा पंडाल तालियों से गूंज उठा। उन्होंने सुनाया कि- लड़कपन से बुढ़ापे तक यहां यौवन नही मिलता, मरुस्थल में किसी प्यासे को सावन नहीं मिलता, सजा रखे हैं सब अंधों ने अपने घर पर आईने, यहां जो आंख वाले हैं उन्हें दर्पण नहीं मिलता। बालाघाट मध्यप्रदेश से आई कवयित्री लता शबनम ने मोहब्बत का फसाना अपने अंदाज में कुछ इस तरह बयां किया- प्यार संसद के सवालों की तरह गूंगा है, प्यार इंसाफ की आंखों की तरह अंधा है, कल मेरी मां ने मुझको भी यह नसीहत दी है ,प्यार न करना कि माहौल बहोत गंदा है। उनके इस अंदाजे बयां पर तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा पंडाल गूंज उठा। बलरामपुर से आई कवयित्री सबा बलरामपुरी ने भी मोहब्बत की जुबां को श्रोताओं तक पहुंचाते हुए पढ़ा- हवा रागिनी सी लगती है, रात अब चांदनी सी लगती है , आपने अपना कह दिया जबसे, जिन्दगी जिन्दगी सी लगती है। लखनऊ के आशीष, डन्डा बनारसी, सौरभकांत शर्मा, अनिल बौझड़, विकास बौखल ने भी काव्यपाठ करके पंडाल में मौजूद लोगों से खूब वाहवाही लूटी। संचालन कमलेश मौर्या और अध्यक्षता पूर्व विधायक सरवर अली ने की।

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