किसान सरकारी खरीद केंद्रों पर जाने से कतराते

Barabanki Updated Thu, 08 Nov 2012 12:00 PM IST
बाराबंकी। टिकैतनगर के बनगवां निवासी ननकऊ ने यूपी एग्रो द्वारा खोले गए खरीद केंद्र पर तकरीबन एक लाख 31 हजार रुपये का गेहूं बेचा था। जिसके लिए इन्हें 11 जून 2012 को चेक संख्या-010934 जारी की गई। भुगतान न होने पर इसी चेक की डेट 13 अक्तूबर तक के लिए फिर बढ़ा दी गई। नतीजा आज भी सिफर है और भुगतान अभी तक नहीं हो सका है। इसी गांव के निवासी प्रेमनरायन ने भी इसी केंद्र पर एक लाख 28 हजार रुपये का गेहूं बेचा था जिस पर इन्हें भी 11 जून 2012 को चेक संख्या-010935 जारी की गई थी। किसानों का कहना है कि दो बार चेक की डेट बढ़ाई जा चुकी है। भुगतान आज तक नहीं हो सका है। यह हाल है जिले में गेहूं खरीद की सरकारी व्यवस्था का। सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं बेचने को लेकर जिस तरह की मारामारी देखने को मिली थी उससे जिले के किसान अभी उबर भी नहीं पाये थे कि अब भुगतान न होने से उनके सामने दो वक्त की रोटी तक का संकट खड़ा हो गया है। गेहूं बेचने के पांच माह बाद भी भुगतान नहीं हो सका है। यही कारण है कि किसान सरकारी केंद्रों पर जाने के बजाए अपना उत्पाद निजी व्यापारियों के हाथों औने-पौने दामों पर बेचना ज्यादा मुनासिब समझते हैं। भुक्तभोगी किसानों का मानना है कि पैसा जरूर कम मिलता है लेकिन व्यापारियों के हाथ गेहूं बेचने के बाद कम से कम भुगतान तो तुरंत हो जाता है। वहीं सरकारी केंद्रों पर गेहूं बेचने वाले सैकड़ों किसानों को अब तक भुगतान नहीं मिल सका है और वे बैंकों के चक्कर लगा रहे हैं। मालूम हो कि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिले इसके लिए जिले भर में सरकारी खरीद केेंद्र खोले जाते हैं लेकिन विभागीय लापरवाही के चलते यह मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। भुगतान पाने के लिए किसान बैंक से लेकर अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं पर इनकी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। जिससे किसानों को आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं किसानों की समस्या का समाधान करने के बजाए विपणन शाखा और एग्रो दोनों विभाग इनकी भूमिका पर ही सवाल लगाने लगे हैं। विभाग का मानना है कि जिस किसान का इतना पैसा बैंक में फंसा होगा वह इतने दिनों तक सब्र नहीं कर सकता है। जांच के बाद ही कुछ कहा जा सकता है।

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