अहंकार रूपी विष त्यागने की सलाह

Banda Updated Fri, 21 Sep 2012 12:00 PM IST
बांदा। तारण तरण दिगंबर जैन परिषद के तत्वावधान में आयोजित पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन प्रवचन में मनुष्य को अहंकार रूपी विष त्याग कर मानव धर्म को सार्थक बनाने की सलाह दी गई।
दिगंबर जैन मंदिर में बृहस्पतिवार को विद्वान अतिथि पदमचंद्र ने स्वामी का संदेश सुनाते हुए कहा कि मान रूपी अहंकार विष के समान है। इसे अपने हृदय से त्याग कर मानव धर्म को सार्थक बनाया जा सकता है। स्वर्ण आभूषण के रूप में अथवा सादा टुकड़ा वह दोनों रूप में शुद्ध रहता है। आभूषण में तमाम धातुएं समाहित होती हैं। इन्हें गलाकर अलग-अलग किया जा सकता है। पिंड रूप से अलग होने के बाद भी सोना शुद्ध होता है। इसी प्रकार हमें अपने सोना रूपी शरीर को शुद्ध रखना है। मान रूपी विष तत्व इसे प्रदूषित कर देता है। मान और अहंकार को त्यागकर जीवन को शुद्ध व सार्थक बनाना चाहिए।
मीडिया प्रभारी दिलीप जैन ने बताया कि पर्यूषण पर्व का दूसरा दिन उजम मार्दव धर्म के रूप में जाना जाता है। कवि नरेंद्र जैन दर्पण की कविता पढ़ते हुए कहा-काल कूट विष पान करे जो, एक ही भव दुख पाता है, मान रूप विष पीने वाला भव-भव दुख दोहराता है।
प्रवचन के समय बड़ी संख्या में अनुयायी मौजूद रहे।

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