‘सफाईकर्मियों की बदहाली को सूबों की सरकार जिम्मेदार’

Banda Updated Tue, 28 Aug 2012 12:00 PM IST
बांदा। सफाई कर्मचारियों की दरिद्रता व अभावग्रस्त जीवन के लिए प्रदेश सरकारें जिम्मेदार हैं। सरकारों ने सिर्फ घड़ियाली आंसू बहाए। हकीकत में उनके लिए कुछ भी नहीं किया। ये बातें राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के सदस्य श्यौराज जीवन ने कहीं। सोमवार को वे जिलाधिकारी कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि देश में अभी भी सिर में मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह खत्म नहीं हुई। केंद्र सरकार ने इसको गंभीरता से लिया है। सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक ने सभी प्रदेशों के मुख्य सचिवों व जिलाधिकारियों को इस कुप्रथा को खत्म कर स्वच्छ शौचालयों की व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही ऐसे परिवारों को चिह्नित कर सम्मानजनक पेशे में लगाने की बात कही है। हाल ही जनगणना में यह तथ्य सामने आए हैं कि 26 लाख लोगों की गंदगी खुली नाली में बहती है और इसे आदमी उठाते हैं या फिर सुअर इसका निपटान करते हैं। उप्र में ऐसे लोगों की सबसे ज्यादा संख्या 4 लाख 16 हजार है। ब्यूरोक्रेसी ने सुप्रीम कोर्ट में मैला ढोने की प्रथा खत्म होने का शपथपत्र भी दिया है। बावजूद इसके नई जनगणना में यह बात सामने आई है कि शौच के लिए देश भर में अब 13 लाख 14 हजार की गंदगी नालियों में गिरती है। सात लाख 94 हजार परिवारों का मैला सिर पर उठाया जाता है।
उन्होंने बताया कि गत 17 व 18 जून को दिल्ली के विज्ञान भवन में दो दिवसीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इससे जुड़े लोगों के हित में कई घोषणाएं कीं। पीएम ने सफाईकर्मियों के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा के साथ खाना और रहना मुफ्त दिए जाने तथा उनकी बस्तियों का सुंदरीकरण, स्कूलों की वाचनालयों की स्थापना, शौचालय व सामुदायिक केंद्रों की स्थापना, उनके बच्चों के लिए लघु उद्योग खुलवाकर उनका पुनर्वास की घोषणा की। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सफाईकर्मियों की स्थिति दयनीय है। उन्हें वेतन, वर्दी, पेंशन व एरियर भी नहीं दिया जा रहा है। सफाई के औजार भी नहीं मुहैया हैं।

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