सुशील के पदक से अखाड़े आबाद

Banda Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
बांदा। बुंदेलखंड में तेजी से लुप्त हो रहे पहलवानी के शौक को लंदन ओलंपिक ने एक बार फिर परवान चढ़ाने की राह पर ला दिया है। पहलवान सुशील को मिले पदक ने अखाड़ों की रौनक फिर बहाल कर दी। युवा पहलवान यह तमन्ना लेकर दांवपेंच में जुट गए हैं कि पहलवानी उन्हें भी किसी मुकाम पर पहुंचाएगी।
काफी दिनों से सूने पडे़ अखाडे़ फिर आबाद होने लगे हैं। नवाब टैंक में स्थित अखाडे़ में सुबह दांवपेंच और कुश्तियां फिर बहाल हो गई हैं। तड़के से युवा पहलवान यहां पसीना बहाने लगे हैं। यह काफी पुराना अखाड़ा है। कुश्ती के गुरु रामदास पहलवान (अलीगंज) ने रोजाना लगभग एक दर्जन पहलवानों को तड़के से आठ बजे तक कुश्ती के दांवपेंच सिखाना शुरू कर दिया है। यह पिछले 50 वर्षाें से पहलवानी कला में खुद को खपाए हुए हैं। 1977 में पांच जिलों की टीमों के साथ दो दिनों में 10 पहलवानों को पटखनी दी थी। इस पर उन्हें चांदी का गदा और प्रशस्ति पत्र मिला था। रामदास की तमन्ना है कि उसके शिष्य भी सुशील जैसा पहलवान बनें और बुुंदेलखंड का नाम रोशन करें। दांवपेंच सीख रहे दादू पहलवान का कहना है कि उसे यह शौक बचपन से है। पांच साल की उम्र से नवाब टैंक अखाडे़ में आने लगा था। कई प्रतियोगिताओं में भाग लिया। अब सुशील की सफलता से सबक लेकर अपनी इस कला में और धार पैदा करने की कोशिश में जुट गया है। कमलेश पहलवान भी 13 वर्षाें से दांवपेंच का खिलाड़ी है। अब उसकी तमन्ना भी ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार जैसा बनने की है। भगवान पर भरोसा है। एक अन्य पहलवान देवराज सिंह के पिता भी पहलवान हैं। कई जनपदों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। बोले, सुशील की सफलता से एक बार फिर पहलवानी का शौक ताजा हो उठा है।

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