रोजे फर्ज हैं ताकि लोग ईमान वाले बन जाएं

Banda Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
बांदा। ऐ ईमान वालों तुम पर रोजे फर्ज किए गए हैं। जैसा कि पहले भी लोगों (उम्मतों) पर फर्ज किए गए थे। ताकि तुम ईमान वाले और परहेजगार बन जाओ। रमजान की एक रात को इबादत का सवाब दूसरी सैकड़ों रातों के बराबर है। शबेकद्र इसी आखिरी अशरे में है।
यह बात विश्व विख्यात मदरसा जामिया अरबिया हथौरा की मसजिद में एतिकाफ के दौरान लखनऊ से आए मौलाना जकरिया ने कही। उन्होंने कहा कि पूरे माह रोजे के साथ नमाजों का भी एहतिमाम करना चाहिए। तरावीह की नमाज भी पाबंदी से पूरे माह पढ़ी जाए। पांच-छह दिन में कलामपाक सुनकर तरावीह पढ़ना बंद कर देना हरगिज मुनासिब नहीं। इस महीने सुन्नत का सवाब फर्ज के बराबर होता और फर्ज का सवाब 70 गुना ज्यादा। यह महीना बरकतों का है। रमजान में रोजा और इबादत करने वालों को पूरे साल किसी तरह की कमी नहीं होती। उसकी हर चीज में बरकत होती है। रमजान के आखिरी अशरे में 21, 23, 25, 27 और 29वीं शब को रातभर जागकर इबादत करनी चाहिए। इस रात की इबादत हजार रात से बढ़कर है। इस रात परवरदिगार से गिड़गिड़ाकर कुछ मांगा जाए तो मिलता है। रोजा सिर्फ खाने-पीने से रुकने का नाम नहीं। जिस्म के हर हिस्से का रोजा होता है। रोजेदार को न गलत बोलना चाहिए। न गलत करना चाहिए। यहां तक की निगाहों, कान, आंख, पैर, सारे अंगों का रोजा होता है।

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