बंदी की मौत पर पुलिस का जांच से इनकार

Banda Updated Fri, 13 Jul 2012 12:00 PM IST
बांदा। यहां मंडल कारागार में वर्ष 2010 में बंदी की मौत के मामले में पुलिस ने जांच से इनकार कर दिया है। इस मामले में न्यायिक जांच में पहले ही जेल प्रशासन को मौत के तथ्य और साक्ष्य छिपाने का दोषी पाया जा चुका है। उधर, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने इस मामले में दोषी जेल अधिकारियों और कर्मचारियों के विरूद्ध की गई कार्रवाई का ब्यौरा 17 जुलाई तक तलब किया है।
एनडीपीएस एक्ट में जेल में बंद चित्रकूट जनपद निवासी पंकज विश्वकर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। जेल प्रशासन ने मौत की वजह मिर्गी का दौरा बताया था। चित्रकूट की अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सोमप्रभा मिश्रा ने इस मामले की न्यायिक जांच की थी। अपनी 28 पृष्ठीय विस्तृत जांच रिपोर्ट में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने लिखा था कि बंदी पंकज की मृत्यु तथा वास्तविक तथ्यों और साक्ष्यों को छिपाने के संबंध में कारागार प्रशासन पूर्ण रूप से उत्तरदायी है। उक्त बंदी की मृत्यु की पृष्ठभूमि में डिप्टी जेलर पीके सिंह की भूमिका भी पाई गई। जेल प्रशासन विभागीय कार्रवाई की बात कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाले रहा। उधर, इसी बीच डीएम कालोनी निवासी संतोष तिवारी ने उच्च स्तर पर शिकायतें करके आरोप लगाया कि बंदी पंकज विश्वकर्मा को उसकी इच्छा के विरूद्ध जेल में पाकशाला में इसलिए लगाया गया कि वह पैसा नहीं दे पाया। उसके जिस्म में चोटों से साबित होता है कि बंदी के साथ उत्पीड़न किया गया। अनुसूचित जाति आयोग के आदेश पर डीआईजी जेल इलाहाबाद ने जांच की। लेकिन अपनी जांच आख्या में लिख दिया कि मृतक पंकज विश्वकर्मा और शिकायतकर्ता (संतोष तिवारी) अनुसूचित जाति के नहीं हैं। इस पर आयोग ने शासनादेश का हवाला देकर कहा कि उसे कार्रवाई का अधिकार है।
उधर, शिकायत पर पुलिस अधीक्षक ने बांदा नगर क्षेत्राधिकारी को इस मामले की जांच के आदेश दिए। लेकिन क्षेत्राधिकारी आशुतोष शुक्ल ने अपनी जांच आख्या यह कहकर पुलिस अधीक्षक को भेज दी कि इस मामले की जांच डीआईजी जेल इलाहाबाद द्वारा की जा चुकी है। दोषी कर्मियों के विरूद्ध विभागीय स्तर से कार्रवाई की जा रही है। ऐसी स्थिति में पुलिस स्तर से अन्य कार्रवाई किए जाने का औचित्य प्रतीत नहीं होता है। पुलिस अधीक्षक ने क्षेत्राधिकारी की इस जांच आख्या को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के सहायक निदेशक तरूण खन्ना को भेज दिया है। उधर, अनुसूचित जाति आयोग ने अपर महानिरीक्षक (प्रशासन) कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवाएं उत्तर प्रदेश को पत्र भेजकर कहा है कि जांच में दोषी पाए गए अधिकारियों और कर्मचारियों के विरूद्ध की गई कार्रवाई का ब्यौरा 17 जुलाई तक आयोग को उपलब्ध कराएं। शिकायतकर्ता संतोष तिवारी का कहना है कि पुलिस और कारागार विभाग लीपापोती कर रही है। दोषियों को बचाया जा रहा है।

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