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नवाब को राखी भेज बोली थीं, बहन की लाज बचा लो

Banda Updated Mon, 18 Jun 2012 12:00 PM IST
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बांदा। भारत मां की लाडली रानी लक्ष्मीबाई झांसी की धरती को आखिरी सलाम करके अपने गोद लिए बच्चे को कमर में बांधकर अप्रैल 1858 को झांसी के किले से कूदकर निकल पड़ी। अंग्रेजी फौज ने पीछा किया। सिर पर कफन बांधे रानी भांडेर में अपने चंद साथियों के साथ अंग्रेजी फौज से घिर गई।
रानी लक्ष्मीबाई ने 1857 को तत्कालीन बांदा नवाब को अपने सिपहसलार के जरिए राखी भेजी और साथ में पैगाम भेजा कि- ‘भाई, बहन की लाज खतरे में है। अंग्रेजों ने झांसी को घेर लिया है। मेरी मदद करो’। नवाब बांदा अली बहादुर सानी 10 हजार फौज का लश्कर लेकर झांसी की ओर चल पड़े। उन्होंने मुंह बोली ‘बहन’ को दुश्मनों से घिरा देखा तो अंग्रेजों पर हमला कर दिया। अंग्रेजी फौजी मारे गए और भाग निकले। रानी काफी घायल थीं। एक नाले के किनारे में बेहोश हो गईं और घोडे़ से गिर गईं। तभी वहां एक कुटी पर बैठे बाबा ने रानी को देखा और उन्हें अपनी कुटी पर लाकर पानी छिड़का। रानी को कुछ होश आ गया। रानी ने बाबा से कहा कि मेरे मरने के बाद इस कुटी में आग लगा देना। फिर नवाब की ओर देखकर रानी बोलीं कि भाई तुमने बहन का साथ आखिर तक निभा दिया। मेरी वसीयत है कि मरने के बाद मेरी लाश अंग्रेजों के हाथ न लगे। इतना कहकर 18 जून 1858 को रानी इस दुनिया से रुखस्त हो गईं। नवाब साहब बांदा की ओर निकल आए। उनके जिस्म में तलवार और भाले के घाव थे।

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