अनुदान मिलते ही ठप हो गए स्वयं सहायता समूह

Banda Updated Tue, 08 May 2012 12:00 PM IST
बांदा। स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत गठित अधिकांश स्वयं सहायता समूहों की गतिविधियां ऋण व अनुदान हासिल करने के बाद ठप हो गईं। ग्राम पंचायतों की बैठकों में समूहों के क्रिया-कलापों का सत्यापन भी नहीं किया गया। छह करोड़ 27 लाख 19 हजार रुपए खर्च करने के बाद भी बेरोजगारों की हालत नहीं सुधरी।
स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत जिले के सभी आठ विकास खंडों में डेयरी उद्योग, बकरी पालन, आटा चक्की, अल्प सिंचाई, तेलघानी, रेडीमेड गारमेंट्स, सुअर पालन, मछली पालन आदि उद्योगों के लिए स्वयं सहायता समूहों और व्यक्तिगत स्वरोजगारियों को ऋण व अनुदान उपलब्ध कराया गया। योजना की गाइड लाइन के मुताबिक इसमें सिर्फ गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार के सदस्यों को ही लाभान्वित किया जाता है। अधिक से अधिक समूहों के गठन और इनके संचालन के लिए सुविधादाताओं का चयन किया गया था। समूह के गठन व ग्रेडिंग के आधार पर बैंक ऋण मुहैया कराने तक उनकी मदद के लिए सुविधादाताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई। इन्हें समूहों के गठन के आधार पर निर्धारित मानदेय दिया जाता था। मानदेय हासिल करने के बाद सुविधादाताओं ने समूहों की ओर मुड़कर नहीं देखा।
वित्तीय वर्ष 2011-12 में योजना के क्रियान्वयन को 5 करोड़ 55 लाख 95 हजार रुपए खर्च करने का लक्ष्य शासन ने निर्धारित किया था। इसमें से 4 करोड़ 16 लाख 96 हजार रुपए केंद्र और एक करोड़ 38 लाख 99 हजार रुपए राज्य से दिया जाना प्रस्तावित था। केंद्र सरकार ने 4 करोड़ 28 लाख 78 हजार रुपए और राज्य सरकार ने एक करोड़ 92 लाख 92 हजार रुपए अवमुक्त किए। वित्तीय वर्ष 2010-11 की बाकी धनराशि 2 करोड़ 83 लाख 95 हजार रुपए भी डीआरडीए के पास डंप थी। 10 करोड़ 45 लाख 16 हजार रुपए के सापेक्ष वित्तीय वर्ष 2011-12 में 6 करोड़ 27 लाख 19 हजार रुपए खर्च किए गए।
डीआरडीए ने उक्त धनराशि खर्च कर 353 स्वयं सहायता समूहों के 3831 स्वरोजगारियों और 504 व्यक्तिगत स्वरोजगारियों को मिलाकर 4335 बीपीएल बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने का दावा किया है। हालांकि अधिकांश स्वयं सहायता समूह कागजों में सिमटकर रह गए। कुछ समूहों ने बैंक ऋण और अनुदान हासिल करने के बाद कामकाज ठप कर दिया।
समूह गठन के लिए मानदेय पर तैनात किए गए सुविधादाताओं ने भी पुराने समूहों को सक्रिय करने पर तवज्जो नहीं दी। प्रगति दिखाने को नए समूह गठित करने में जुटे रहे। उक्त सुविधादाताओं पर वित्तीय वर्ष में 58 लाख 35 हजार रुपए खर्च कर दिए गए। तमाम स्वयंसेवी संस्थाओं ने स्वरोजगारियों के प्रशिक्षण के नाम पर भी फायदा उठाया। प्रशिक्षण में 20 लाख 15 हजार रुपए खर्च हुए। लाभार्थियों को 8 करोड़ 79 लाख 18 हजार रुपए बैंक ऋण और अनुदान के रूप में 4 करोड़ 21 लाख 14 हजार रुपए वितरित किए गए। इसमें बड़ोखर खुर्द ब्लाक में 61 लाख 6 हजार, तिंदवारी ब्लाक में 50 लाख 44 हजार, जसुपरा में 30 लाख 85 हजार, महुआ में 72 लाख 30 हजार, नरैनी में 72 लाख 75 हजार, बबेरू में 48 लाख 80 हजार, बिसंडा में 48 लाख 70 हजार और कमासिन ब्लाक के स्वरोजगारियों को 36 लाख 17 हजार रुपए अनुदान दिया गया। सीडीओ हृदयशंकर तिवारी का कहना है कि निष्क्रिय समूहों से अनुदान राशि वसूली जाएगी। बैठकों में समूहों के सत्यापन के निर्देश दिए गए हैं।

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