नेशनल मिशन ऑनमाइक्रो इरिगेशन योजना में खेल

Banda Updated Fri, 24 Jan 2014 05:48 AM IST
बांदा। किसानों को साग-सब्जी और फल-फूल की खेती के लिए प्रोत्साहित करने की नेशनल मिशन ऑन माइक्रो इरिगेशन योजना अधिकारियों की कमाई का जरिया बन गई है। उद्यान विभाग में ड्रिप-स्प्रिंकलर वितरण से लेकर लाभार्थी चयन और पाइप वितरण में शासनादेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। उप निदेशक और लिपिक ने सारी प्रक्रिया पूरी कर ली और डीएचओ को भनक भी नहीं लगी। डीएचओ ने डीएम समेत आला अधिकारियों से सरकारी योजनाओं में चल रहे फर्जीवाड़े को रोकने की मांग की है।
19 लाख रुपये की योजना में 50 हेक्टेयर का लक्ष्य रखा गया था। लाभार्थियों में उन किसानों को शामिल करना था, जिनके पास कम से कम एक हेक्टेयर में आंवला, अमरूद, नींबू आदि की बागवानी हो या फिर साग-सब्जी किए हो लेकिन लाभार्थी चयन में नियमों की अनदेखी की गई। शासनादेश के मुताबिक डीएचओ की जांच और सहमति के बाद ही लाभार्थियों की सूची जारी कर उन्हें पाइपों का वितरण होना चाहिए। लेकिन उप निदेशक उद्यान और पटल प्रभारी की साठगांठ से सारी प्रक्रिया पूरी हो गई। डीएचओ से कहीं हस्ताक्षर नहीं कराए गए। नियमत: उद्यान विभाग अनुदान का चेक किसानों के नाम जारी करेगा और किसान क्रास चेक फर्म को खुद भेजेगा लेकिन विभाग द्वारा सीधे भुगतान किया जा रहा है।
जिला उद्यान अधिकारी महेंद्र सिंह गौतम ने डीएम को 11 दिसंबर को भेजे पत्र में डीडी द्वारा किए जा रहे फर्जी बिलों और बाउचरों के भुगतान पर रोक लगाने तथा जांच की मांग की है। पत्र में उन्होंने कहा कि मनरेगा के तहत उद्यान विभाग को 5.90 लाख रुपये मिले हैं। इसमें 3.62 लाख रुपये खर्च कर दिए गए। योजना कहां और किस ब्लाक में चल रही है? इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है। उद्यान नर्सरी कई सालों से घाटे में चल रही है। फिर भी उसमें नियम विपरीत लाखों रुपये खर्च किया जा रहा है। इसी तरह 30 किसानों को स्प्रिंकलर सेट वितरित किए गए हैं। फर्म से कब सामान आया और किस स्थान वितरित किया गया? किसी को जानकारी नहीं है, जबकि उन्हें शासन से यहां डीएचओ के पद पर तैनात किया है। ऐसे में वह बैठकों में अधिकारियों को कोई विभागीय जानकारी नहीं दे पा रहे हैं।
कृषि उप निदेशक अखंड प्रताप सिंह का कहना है कि शासन की मंशानुरूप ही योजनाओं का लाभ पात्र किसानों का दिया जा रहा है। उन पर लगाए जा रहे आरोप द्वेष भावना से प्रेरित और अनर्गल हैं। क्रास चेक व भुगतान जैसे कुछ मामलों में गाइड लाइन की बजाय व्यवहारिक में काम किया जा रहा है। इसमें किसी तरह नियमों की अनदेखी नहीं है।

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