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‘दुनिया में आम अब भी गालिब की शायरी...’

Banda Updated Sat, 29 Dec 2012 05:30 AM IST
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बांदा। मशहूर शायर मिर्जा असद उल्ला खां ‘गालिब’ की 215वीं बरसी पर शायरों ने ‘गालिब-डे’ मानकर उन्हें याद किया। गालिब की शायरी को बेमिसाल बताकर अपने शेरों से उन्हें खिराजे अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश की।
शायर डा.खालिद इजहार बांदवी के आवास पर आयोजित गालिब-डे की शुरुआत तालिब बांदवी ने नात से की। वरिष्ठ शायर मास्टर नवाब असर खास मेहमान बने। सदारत बुजुर्ग शायर निश्तर बांदवी ने संभाली। मेजबान डा.खालिद इजहार ने शेर पढ़ा-‘दुनिया में आम अब भी है गालिब की शायरी, उर्दू को इक इनाम है गालिब की शायरी, शायर तो दाग मीर सौदा भी थे मगर, रखती अलग मुकाम है गालिब की शायरी।’ शरीफ बांदवी ने शेर पढ़ा-‘कोशिश तमाम करता हूं दिन-रात दोस्तो, अरमान फिर भी दिल से निकलता नहीं कोई।’ तारिक अजीज ने कहा-‘दाने-दाने को किया मोहताज उनको आपने, क्या इसी दिन के लिए पाला था तुमको बाप ने।’ बशीर तालिब ने पढ़ा-‘जिसके घर जवान है बेटी, होके बेफिक्र सो नहीं सकता।’ काजी जमीर ने सुनाया-‘हर रिश्ते की कीमत लोग लगाते हैं यहां, मुआशरा न हुआ मीना बाजार हो गया।’ नवाब असर का शेर था-‘ताना देते हैं और हंसते हैं कुछ असर बुग्ज दिल में रखते हैं।’ मुशायरे में असगर, शरीफ, अहमद दिलनवाज आदि शायरों ने भी कलाम पेश किया। इस मौके पर हाफिज रऊफ, नजरे आलम, रफत खां गोगा, पहलवान हाशिम अंसारी मौजूद रहे।

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