फाइलों में धूल फांक रहा प्रतिबंध का कानून

Banda Updated Tue, 16 Oct 2012 12:00 PM IST
बांदा। बढ़ते प्रदूषण पर प्रभावी अंकुश लगानेे के लिए वर्ष 2010 में लागू प्लास्टिक निर्माण विक्रय व उपयोग अधिनियम फाइलों में धूल फांक रहा है। प्रतिबंधित प्लास्टिक थैलों का चलन मवेशियों व लोगों को मौत की गर्त में धकेल रहा है। पालीथिन के प्रयोग पर रोक के लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधीन मंडल, जिला व नगर पंचायत स्तर पर गठित की गई टीमें पूरी तरह निष्क्रिय हैं। फिलहाल इस कानून का उल्लंघन करने वालों पर सरकार से तय जुर्माना व सजा का प्रावधान बेअसर है।
जहरीली साबित हो रहीं पालीथिन के उपयोग पर रोक लगाने के लिए वर्ष 2010 में सूबे में ‘प्लास्टिक बी निर्माण विक्रय एवं उपयोग नियम’ के तहत कानून लागू किया गया था। नगर पालिका में अधिशाषी अधिकारी, सफाई निरीक्षक व स्वास्थ्य अधिकारी की तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। सहयोग में वार्ड सदस्यों को लगाया गया। इसी तरह नगर पंचायत स्तर पर ईओ की अगुवाई में पंचायत कर्मियों की समिति बनाई गई। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधीन काम करने वाली ये समितियां कुछ दिन तो प्रभावी रहीं, पर अब पूरी तरह निष्क्रिय हैं। जहरीले रंगों से बनी पालीथिन धड़ल्ले से उपयोग हो रही हैं। उपयोग करने वाले इसके कुप्रभावों से अनजान हैं। प्रशासन व जिम्मेदार लोग उच्चतम न्यायालय व शासन के आदेश की अनदेखी कर रहे हैं।
यह है कार्रवाई का प्रावधान
बांदा। प्लास्टिक बी निर्माण विक्रय व उपयोग अधिनियम के तहत दोष सिद्ध होने पर धारा-8 के अधीन एक माह की सजा या पांच हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान है। दूसरी बार पकड़े जाने पर माल के जब्तीकरण के साथ छह माह की सजा या फिर 10 हजार रुपए जुर्माना हो सकता है। 20 माइक्रोन से कम मोटाई के प्लास्टिक कैरी बैगों का उपयोग प्रतिबंधित है। 50 कैरी बैगों का भार 105 ग्राम से कम नहीं होना चाहिए।
आखिर किसे सौंपे जब्त माल या जुर्माना
बांदा। प्लास्टिक पालीथिन के उपयोग पर रोक लगाने के लिए समितियां गठित कर अधिकारियों को जिम्मेदारी तो सौंप दी गईं, पर आगे की कार्रवाई का प्रावधान नहीं किया गया। समिति अधिकारी छापामार कर जो माल जब्त करते हैं उसे आखिर कहां रखें, या इस कानून का उल्लंघन करने वालों से जुर्माना वसूलकर किसे दें ? संबंधित को पकड़कर किस मजिस्ट्रेट के पास पेश करें ? यह खुद समिति के अधिकारी भी नहीं जानते। पालिका के अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने प्रतिष्ठानों से प्रतिबंधित पन्नियों को एकाध बार जब्त किया और लोगों को भी पकड़ा, लेकिन बाद में छोड़ना पड़ा।
प्लास्टिक से होने वाले कुप्रभाव
बांदा। नगर पालिका सफाई निरीक्षक जितेंद्र गांधी का करना है कि कागज, फल व सब्जियों को जैविक प्रक्रिया से नष्ट होने में एक माह का समय लगता है, पर प्लास्टिक दस लाख साल तक नहीं सड़ती। प्लास्टिक कचरा सीवर व नालियों को जाम कर देता है। इससे बीमारी और महामारी फैलती है। प्लास्टिक बैगों में जहरीले रंग का प्रयोग होता है, जो खाद्य पदार्थ पर प्रभाव छोड़ता है। इससे लोगों पर हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। प्लास्टिक बैग में छिलका व खाद्य पदार्थ रख फेंकने से इसे गाय व अन्य मवेशी खाते हैं, जिससे उनकी मौत हो जाती है।
लोगों को जागरूक कर रही समिति : प्रभारी ईओ
बांदा। नगर पालिका के अधिशाषी अभियंता/एसडीएम गिरीश कुमार शर्मा ने बताया कि इस पर रोक के लिए समिति समय पर लोगों को जागरूक करती है। पूर्व में समिति की तरफ से लोगों में कपड़े के थैले बांटे गए थे। शहर में लोगों की जागरूकता के लिए बैनर व पंफलेट लगाए जा रहे हैं। वातावरण को दूषित होने से बचाने के लिए लोगों की जागरूकता जरूरी है। डिस्पोजल की जगह लोग कुल्हड़, दोना व पत्तल का प्रयोग करें। बाजार कपड़े का थैला लेकर ही जाएं।

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