नहीं दोहराया जाएगा 512 साल पुराने बलरामपुर दशहरे का इतिहास

Lucknow Bureauलखनऊ ब्यूरो Updated Sat, 24 Oct 2020 10:44 PM IST
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बलरामपुर। बलरामपुर दशहरे का इतिहास 512 साल पुराना है। गुजरात के रियासत जंवाड़ा पावागढ़ किला से आए महाराज बरियार शाह ने इसकी शुरुआत की थी। कोरोना महामारी के चलते इस साल दशहरा नहीं मनाया जाएगा। दशहरा देखने वालों में आयोजन स्थगित होने से मायूसी है।
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वर्ष 1269 ई. में महाराज बरियार शाह गुजरात के रियासत जंवाड़ा पावागढ़ किला से आकर तराई क्षेत्र इकौना में आकर बसे थे। 1508 में इन्हीं के वंशज महाराजा गंगाशाह बलरामपुर आकर बसे और बलरामपुर रियासत की नींव रखी तभी से यहां दशहरा मनाने के परंपरा की शुरुआत हुई। 1836 में बलरामपुर रियासत के महराजा बने दिग्विजय सिंह ने दशहरे को 1859 में भव्य स्वरूप दे दिया।
दशहरे के दिन राम बारात, राम लक्ष्मण स्वागत व पूजन तथा राम-रावण युद्घ के पश्चात रावण, कुंभकर्ण व मेघनाथ के पुतले का दहन किया जाता रहा है। यह पर्व हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी बन गया। तीन दिनों तक यह पर्व मनाया जाने लगा। इस पर्व में कई रियासतों के पहलवान, तलवारबाज, निशानेबाज व घुड़सवार आदि अपना-अपना हुनर दिखाते थे।
दहशरा देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग बलरामपुर आते थे। नेपाल से भी भारी संख्या में लोग बलरामपुर दशहरा देखने आते थे। नेपाल के शाही परिवार से बलरामपुर रियासत का रोटी-बेटी का संबंध सदियों पुराना है। बलरामपुर स्टेट के वर्तमान महराज जयेन्द्र प्रताप सिंह बताते हैं कि दशहरे के दिन हमारे यहां शस्त्र पूजा व राम लक्ष्मण की आरती व पूजन का विशेष महत्व है। इस दिन हम लोग रावण का पुतला दहन कर बुराई समाप्त करने तथा अच्छाई के मार्ग पर चलने का संकल्प सदियों से लेते आ रहे हैं।
आजादी के बाद वर्ष 1952 से इस पर्व के आयोजन की जिम्मेदारी सनातन धर्म सभा निभा रही थी। वर्ष 2005 में सनातन धर्म सभा ने तत्कालीन महाराज धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के दशहरे के आयोजन का जिम्मा लेने का अनुरोध किया। तभी से इसका आयोजन बलरामपुर स्टेट तथा सनातन धर्मसभा संयुक्त रूप से कर रही थी। इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण सदियों पुरानी इस परंपरा का निर्वहन स्थगित हुआ है। परिस्थितियां अनुकूल रही तो अगले वर्ष से इसका आयोजन फिर से बहाल कर दिया जाएगा।

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