मंगल पांडेय ने फूंका थ्ाा आजादी का बिगुल

Ballia Updated Wed, 30 Jan 2013 05:30 AM IST
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दुबहर। ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में प्रथम आहुति देने वाले मंगल पांडेय का जन्म 30 जनवरी 1831 को बलिया जनपद के नगवां गांव में हुआ था। बुधवार को देश के प्रथम शहीद का जन्मदिन मनाने की तैयारी उनके पैतृक गांव समेत जनपद के कोने-कोने में चल रही है।
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सुदिष्ट पांडेय एवं जानकी देवी के पुत्र मंगल पांडेय जन्म से ही देश प्रेम व स्वाभिमानी रहे हैं। वह हमेशा राष्ट्र के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। उनके भाई ललित पांडेय और गिरिवर पांडेय में भी अनूठा देश प्रेम भरा हुआ था। मंगल पांडेय सेना में भर्ती होकर देश सेवा करना चाहते थे। वे 18 वर्ष की आयु में ही सेना में भर्ती हो गए। उस समय भारत में अंग्रेजों का राज्य स्थापित था। साम्राज्य को विस्तार देने के लिए अंग्रेज सभी हथकंडे अपना रहे थे जो मानवीय दृष्टि से अनैतिक थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में गोरे तथा देशी सैनिकों में भेदभाव शुरू हो गया था। अधिक मेहनत करने पर भी कम वेतन, कम सुविधाएं तथा उच्च पदों से दूर रखना आदि के साथ गोरे अफसरों द्वारा नित्य अपमान जैसी बातें सैनिकों के मन में उबाल ला रही थी। फरवरी 1857 में मंगल पांडेय ने चर्बी लगी कारतूस उपयोग करने से मना कर दिया। अंग्रेजाें ने देशी सिपाहियों की तलाशी के लिए योजना बनाई। मंगल पांडेय ने बगावत के लिए सैनिकों को इक्कठा कर परेड ग्राउंड पर ही साथियों को विद्रोह के लिए ललकारा।

उसी समय अंग्रेज सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने मंगल पांडेय को गिरफ्तार करने के लिए सिपाहियों को आदेश दिया। लेकिन कोई भी सिपाही आगे नहीं बढ़ा। गिरफ्तारी की बात सुन मंगल पांडेय का खून खौल उठा और उन्होंने मेजर ह्यूसन को गोली मार दी। मेजर की मौत की खबर सुन लेफ्टिनेंट बाब आया जिसे मंगल पांडेय ने मार गिराया।
इस बगावत की खबर सुन कुछ गोरे सैनिकों को लेकर कर्नल हिअर्सी ने पूरी बैरकपुर छावनी को घेर लिया। चारों तरफ से घिरते देख मंगल पांडेय ने अपनी ही बंदूक से अपने सीने में गोली मार ली। घायलावस्था में मंगल पांडेय को अस्पताल में भर्ती कराया गया और वह स्वस्थ हो गए। इसके बाद उनके ऊपर फौजी अदालत में मुकदमा चलाया गया। जिसमें उन्हें अदालत ने दोषी ठहराया और आठ अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी दे दी गई।

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