सूर्योपासना का महापर्व मनाने को घाटों पर उमड़ा जनसैलाब

Ballia Updated Tue, 20 Nov 2012 12:00 PM IST
d संवाददाता
फेफना। उत्तर और मध्य भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने वाला सूर्योपासना के महापर्व के लिए नदी के तटों और सरोवरों पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। व्रती महिलाओं ने सोमवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया। पारन मंगलवार को प्रात: 6.40 बजे किया जाएगा। इस दिन सूर्यषष्टी पूजा के लिए पिछले तीन दिनों से व्रती महिलाओं ने नहाय-खाय, खरना के बाद निर्जला व्रत कर सूर्य की उपासना की।
पंडितों की माने तो भगवती के मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण विश्व में षष्ठी नाम से प्रसिद्ध हुई देवी के निर्जला व्रत में शरीर वस्त्र और पूजन सामग्री की पवित्रता एवं शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। नदी, सरोवर आदि तट पर मिट्टी की गोल वेदी बनाकर रोड़ी, आटा, हल्दी से रंगीन बनाकर उस पर षष्ठी देवी का आह्वान किया जाता है। मूलमंत्र से देवी पाद्य, अर्घ्य, गंध, पुष्प, धूप, दीप और विभिन्न प्रकार के नैवेद्य एवं कई प्रकार के फलों से देवी षष्ठी की पूजा की जाती है। इसके उपरांत मन को शांत करके भक्ति पूर्वक स्तुति की जाती है। महिलाएं विभिन्न प्रकार के गीत गाती हैं। देवी को नमन करने के साथ ही साथ पहले दिन अस्ताचलगामी सूर्य को एवं दूसरे दिन प्रात: सूर्योदय होने पर अर्घ्य दिया जाता है। ब्रह्मवैद्य पुराण के प्रकृति खंड के 45वें अध्याय षष्ठी देवी के संबंध में वृतांत प्राप्त होता है। इसके अनुसार सतयुग में स्वायंभुव और मनु के पुत्र प्रियव्रत नाम के एक राजा ने अपने निष्प्राण पुत्र के काया में प्राण संचार करने के लिए सर्वप्रथम षष्ठी देवी की उपासना की थी। देवी की कृपा से राजा का पुत्र दीर्घायु हुआ। जो आगे चलकर सुव्रत नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा 100 यज्ञ का एकसाथ आयोजन किया। देवी की आज्ञा से ही राजा ने अपने समस्त प्रजा से इस व्रत को करने का आग्रह किया। तभी से इस व्रत को किया जाता है और लोग भगवान भास्कर के माध्यम से अपनी पूजा देवी को समर्पित करते हैं। भगवती मूल प्रकृति की छठे अंश से उत्पन्न षष्ठी देवी अखिल मातृकाओं में प्रसिद्ध है। यह भगवान शिव के पुत्र अशकंध की दयिता है। इन षष्ठी देवी की कृपा से पुत्रहीन व्यक्ति को पुत्र व कर्मशील पुरुष कर्मों का उत्तम फल प्राप्त करते हैं।

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