दूसरों की सेवा में तलाशते रोशनी

Ballia Updated Wed, 14 Nov 2012 12:00 PM IST
बलिया। दिवाली का पर्व जहां हर लोगों के जीवन में रोशनी भर देता है, वहीं नगर क्षेत्र में एक तबके के लोग ऐसे भी है जो फर्श पर जिल्लत भरी गुलामी और बंधुआ मजदूर की तरह जीवन जीने को विवश हैं। दिवाली, होली, दशहरा कोई भी त्योहार आए इनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं है। हजारों की संख्या में ऐसे ही मजदूर, चाय-पान की दुकान, होटल, रिक्शा, जूते एवं सैलून की दुकान पर जीवन की रोशनी तलाशते देखे गए। इन्हें त्योहार की नहीं सिर्फ निवाले की फिक्र होती है।
नगर में रिक्शा चलाकर दो जून की रोटी कमाने वाले गुदरी बाजार निवासी बाबू साहू का कहना है कि जिनके घर मेें चूल्हा फूंकने के लिए लकड़ी नहीं वह भला दीप और मोमबत्ती की सजावट से दिवाली कैसे मनाएगा? पेट की भूख के आगे कहां याद रह जाता है होली, दशहरा और दिवाली। जिल के सीताराम कई वर्षों से स्टेशन के बाहर लोगों के जूता-चप्पल की मरम्मत करते हैं। जिनके 50 से 100 रुपये की मामूली कमाई से हर पर्व, त्योहार फीका रह जाता है। नगर क्षेत्र के एक होटल पर मजदूरी करने वाले लालू गाेंड का कहना है कि उसके लिए दशहरा-दिवाली कुछ मायने नहीं रखता। बताया कि रोज की तरह उसे आज के दिन भी होटल में ही रहकर काम करना है और रात को रूखी-सूखी रोटी खाकर सो जाना है। द्वाबा क्षेत्र के रामजी रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते हैं। कहा कि छठ के त्योहार पर ही अपने बच्चों का दीदार होता है। चित्तू पांडेय चौराहे पर लोगों के बाल-दाढ़ी बनाने वाले राकेश का कहना है कि दिवाली और होली का पर्व आर्थिक रूप से परिपूर्ण लोगों का है।

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