काव्य संध्या मेंे बांधा समा

Ballia Updated Mon, 29 Oct 2012 12:00 PM IST
बलिया। विश्व भोजपुरी सम्मेलन के तत्वावधान में नगर के बेदुआ में काव्य-संध्या का आयोजन शनिवार को किया गया। वर्तमान समय-संदर्भ और समाज में साहित्यकार की चिंता और बेचैनी ही नया सृजन करता है। इस भाव को डा. अशोक द्विवेदी ने अपनी कविता में व्यक्त किया। काव्य संध्या कार्यक्रम का शुभारंभ शिवजी पांडेय रसराज ने सरस्वती वंदना से किया।
शनिवार को आयोजित काव्य संध्या में रसराज ने अपनी रचना ‘ढूंढे मन जिनगी के...।’ को सुना लोगों को मंत्र मुग्ध कर दिया। इसी क्रम में डा. अशोक द्विवेदी ने ‘मंत्री, सैनिक क्षुद्र पियादा राजा खातिर बर बिसात पर / तुहीं बताव जागी कबले केकरा खातिर रात-रात भर ?’, पटना से आए कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी ने संस्कृति एवं साहित्य के प्रति लोगों की अन्य मनस्कता को रेखांकित करते हुए ‘चाह बहुत बा, राहे नइखे। कतनो पवरी, थाहे नइखे’, हीरा लाल हीरा ने काव्य रचना के माध्यम से ‘अब मुंडेर ना कागा उचरे, ना देला संदेश। गौरइया ना अंगना फुदके, बदलि गइल परिवेश।’ कन्हैया पांडेय ने गरीबों के हक ‘ना भइया, अब इ ना होई। गटक लेके, हक हमार तु, हम छछनी छिछियांइ प्रस्तुत किया। इस मौके पर शशि प्रेम देव, रामेश्वर सिंह, श्रीराम सिंह आदि लोगों ने भी रचनाएं पढ़ी। देर रात तक लोग कार्यक्रम का लुत्फ उठाते रहे।

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