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जी रहे खानाबदोश जिंदगी!

Ballia Updated Sat, 13 Oct 2012 12:00 PM IST
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रामगढ़। गंगा व घाघरा की बेरहम लहरों से कटान पीड़ित बेघर होकर खानाबदोश की जिंदगी जीने को विवश है। द्वाबा में सन् 1977 से ही गंगा व घाघरा की प्रलयकारी लहरें गांव को अपने पेटे में समाहित करती आ रही हैं। आलम यह है कि अब तक इलाके के गायघाट, मझाैंवा, पचरूखिया, डागंरबाद, शुक्लछपरा, गंगापुर, मीनापुर, हुकूम छपरा, तेलिया टोला, शाहपुर, रिकनी छपरा, गंगौली, शाहपुर (बैरिया) आदि गांव नदी में समाहित हो चुके हैं। जिसके चलते हजारों की संख्या में लोग एनएच-31 पर अपना आशियाना बनाकर खानाबदोश की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। कटान पीड़ित देव बिंद का कहना है कि प्रतिवर्ष गंगा व घाघरा की विनाशकारी लहरें गांवों की अमनचैन, खुशियां व दो-जून की रोटी भी छीन लेती हैं।
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कटान पीड़ित निर्मल खरवार का कहना है कि जिस समय हम पीड़ितों का घर गंगा में विलीन हो रहा था। रिकनीछपरा निवासी राकेश शुक्ल व रामेश्वर सिंह का कहना है कि इस बार भी गंगा ने रिकनी छपरा, शाहपुर, नरदरा, भूसौला का अस्तित्व मिटाने पर तुली है और दो सौ से अधिक परिवार घर से बेघर हो गए हैं। बैरिया तहसील प्रशासन ने नरदरा व भूसौला के कटान पीड़ितों को दो से पांच हजार की सहायता चेक देकर कागजी कोरम पूरा कर लिया। लेकिन रिकनीछपरा व शाहपुर के पीड़ितों को एक फूटी कौड़ी तक नसीब नहीं हुआ। जिससे कटान पीड़ितों में शासन व प्रशासन के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

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