खंडित आस्थाएं और उदास रामजनम शाह

Ballia Updated Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
जयप्रकाश नगर (बलिया)। बबुरानी (जयप्रकाश नगर का पुराना नाम) के 92 साल रामजनम शाह बेहद उदास थे। न घर की दीवार से सटे उस परिसर में गए जहां उनके बचपन के साथी बउल (जेपी का बचपन का नाम) की याद में बड़ी-बड़ी बातें हो रहीं थी। न ही बगल के लालटोला वाले क्रांति मैदान में, जहां बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी जेपी को याद करने उड़नखटोले से आए थे। पर सुबह से ही नहा धोकर घर के बाहर बैठ गए थे और जो भी पकड़ में आ जाता, यादों की जुगाली के सहारे अपने बउल की बातें साझा करने में विराम नहीं ले रहे थे। रामजनम जेपी के गांव के ही हैं। बचपन में काफी समय साथ बिताया। यादों का लंबा पिटारा है। बात करने से पहले चश्मा पहनते हैं, और दांतों की बत्तीसी भी। कहते हैं, जेपी भी नफीस थे, कपड़ों से लेकर दाढ़ी बनाने से लेकर जूते में पालिश करने तक। एकदम झकाझक रहते थे। बातों का सिरा घूम जाता है, बताते हैं गांव किनारे गंगा बहती वहीं एक तपसी (तपस्वी) बाबा थे, कहते थे कि बउल, बउल नहीं रहेगा, एक दिन इसकी बात सारा देश सुनेगा। तपसी बाबा की बात तब समझ में आई जब इमरजेंसी लगी और देश में जनता पार्टी की सरकार बनी।
रामजनम को इस बात का फख्र है कि जेपी के जब गुर्दे खराब हो गए थे, और इलाज के लिए उन्हें पैसे की जरूरत थी, तब उन्होंने इधर-उधर से जतन कर 75 रुपये का मनीआर्डर कदमकुआं (पटना) वाले पते पर किया था, जिसे जेपी ने स्वीकार कर लिया था, पर इंदिरा जी की मदद नहीं ली। बकौल रामजनम इंदिरा जी ने 90 हजार रुपये भेजे थे, जेपी ने एक रुपया रख लिया था और 89999 वापस कर दिए थे। चंद्रशेखर ने जेपी की याद में जब जयप्रकाशनगर का कायाकल्प किया तो रामजनम को बहुत अच्छा लगा। चंद्रशेखर के हर काम में मदद करते थे। रामजनम बताते हैं कि चंद्रशेखर के जाने के बाद यहां सब कुछ है, वही इमारतें, वहीं हरियाली पर रौनक चली गई। अब न जेपी के जन्मदिन पर न कोई रामजनम को बुलाता है और न वह जाते हैं। कहते हैं कि जेपी को महसूस करने वाला क्या कोई वहां आता है। टूटा हुआ दिल सिर्फ इस तरफ नहीं। लाला टोला (सिताबदियारा का बिहार वाला हिस्सा) के लोगों को गुरूवार को यह बात बहुत अखरी कि बिहार के उपमुख्यमंत्री जहाज से आकर बड़ी-बड़ी बातें करके तो चले गए पर जेपी के गांव लोगों से मिले तक नहीं। जयप्रभा प्रतिष्ठान के आलोक सिंह बताते हैं कि सिताबदियारा के वजूद को घाघरा की कटान से समस्या हो सकती है।
मंत्री लोग हम लोगों से बात करते तो इस समस्या का जिक्र करते पर। उदास मन से कहते हैं कि उनका यहां आने का मकसद जेपी की स्मृतियों को संजोने का तो था नहीं।
तकलीफ तो उन लोगों को भी हुई जो जेपी को कभी बिहार या यूपी में विभाजित करके नहीं देखे। पहले बिहार वालों के कार्यक्रम में शामिल होकर जयप्रकाश नगर आए पड़ोस के कमला यादव ने कहा कि तकलीफ की बात है कि लोकनायक के नाम पर अपनी सियासत कलफ करने वालों ने न केवल भूगोल के आधार पर उनकी शख्सियत को बांटने की कोशिश की बल्कि अपने-अपने सियासी खेमों में खींचने की फूहड़ कोशिशें प्रारंभ कर दी है। बिहार वाले उन्हें भाजपाई बनाने पर आमदा हैं तो इधर वाले सपाई (न कि समाजवादी)।
शायद यही कारण रहा होगा जिसकी वजह से सारी जिंदगी यायावरी के साथआदमी की वकालत करने वाले चितरंजन सिंह सरीखे (पीयूसीएल वाले) जेपी को श्रद्रासुमन चढ़ाने जयप्रकाश नगर तो पहुंचे पर किसी मंच के करीब नहीं गए।

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