क्रांतिकारी महिला ने किया था कैप्टन मूर पर प्रहार

Ballia Updated Sat, 25 Aug 2012 12:00 PM IST
बिल्थरारोड। आजादी की लड़ाई में बागी बलिया का चरौवां ग्राम क्रांतिकारियों के गुप्त गतिविधियों का केंद्र था। यहां के सेनानियों ने न सिर्फ अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए, बल्कि अपने प्राणों की आहुति देकर इतिहास रचा। आजादी के जुनून में सेनानियों की लाठी गोरों के राइफल व मशीन गनों पर भारी पड़ी थी। आजादी के दीवानों ने अपने त्याग, शौर्य, बलिदान और साहस की जो मिशाल पेश की वह स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।
1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बलिया के हौसलाबुलंद क्रांतिकारियों पर लगाम कसने के लिए अंग्रेज हुक्मरानों द्वारा गठित विशेषाधिकार युक्त सर्वोच्च प्रशासक नेदरसोल एवं मार्क्स स्मिथ के नेतृत्व में फौज की टुकड़ी जल मार्ग से बलिया पहुंची। इसका एक दस्ता कैप्टन मूर की देखरेख में चरौवां पहुंचा। कैप्टन ने गांव के सरपंच के पास चौकीदार भेज क्रांतिकारियों को अंग्रेजों को सौंपने का संदेश भेजा। सरपंच के पास पहुंच चौकीदार ने कैप्टन मूर का संदेश कहना शुरू किया था। इस बीच सरपंच ने ऐसा करारा तमाचा जड़ा की चौकीदार का कान फट गया और उससे खून बह निकला। यह देख अंग्रेज बौखला गए और पूरे गांव को घेर लिया। इसके बाद शुरू हुआ अंग्रेजों का दमन चक्र। इस बीच एक ग्रामीण क्रांतिकारी ने ललकारा कि गोरों के पास दो हाथ की मशीन है, तो हमारे हाथ में छह फीट की लाठी। यह सुनते ही ग्रामीण लाठी-डंडा लेकर अंग्रेजों पर टूट पड़े। गोरों में खलबली मच गई। गांव की मकतुलिया मालिन ने कैप्टन मूर के सिर पर हांडी से हमला बोल दिया। कैप्टन ने मकतुलिया को गोलियों से छलनी कर लाश घाघरा नदी में फेंकवा दिया। गांव पर मशीनगनों की बौछार शुरू हो गई। कई स्थानों पर ग्रामीणों ने अंग्रेजों से मोर्चा लिया। क्रांतिकारियों और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ जिसमें ग्रामीणों ने कई अंग्रेजों को लहूलुहान कर दिया। वहीं अंग्रेजों से जुझते हुए खरबियार, मंगला सिंह और शिवशंकर सिंह शहीद हो गए। रणबांकुरे हंसते-हंसते देश के लिए बलिदान हो गए। फिरंगियों ने पूरे गांव में जमकर लूटपाट की। कन्हैया सिंह, राधा किशुन सिंह, बृज बिहारी सिंह, मृगराज सिंह, शंभू सिंह, श्रीराम तिवारी, कपिल देव सिंह, दशरथ सिंह, हरि प्रसाद स्वर्णकार व कामता स्वर्णकार ने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी जिन्हें अंग्रेजों ने जेल की सलाखों में बंद कर दिया।

आजाद हिंद के क्रांतिकारियों ने भरा था जोश
बिल्थरारोड। चरौंवा ग्राम की घटना के 10 दिन पहले 14 अगस्त को इलाहाबाद से छात्र-छात्राओं की आजाद हिंद ट्रेन बिल्थरारोड आई थी। ट्रेन से आए क्रांतिकारी युवक-युवतियों ने बिल्थरावासियों को ललकारा। आजादी की ललक जगाकर क्रांतिकारियों ने लोगों में जोश भर दिया था। इससे क्रांति की ज्वाला फूट पड़ी थी। आक्रोशित क्रांतिकारियों ने रेलवे स्टेशन और मालगोदाम फूंक डाले, तार काट दिए तथा पूरी सरकारी व्यवस्था को तहसनहस कर दिया। रेलवे लाइन उखाड़ते समय डीएवी इंटर कालेज के अध्यापक चंद्रजीत सिंह शहीद हो गए। अंग्रेजों के तांडव का जायजा लेने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने फिरोज गांधी को यहां भेजा था। गोरों के दमन चक्र की कहानी सुन फिरोज गांधी की आंखें छलछला आईं थीं। बलिया की बारडोली कहे जाने वाला चरौवां ग्राम आज मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। सरकार चरौंवा को शहीद ग्राम का दर्जा दे दे तो समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

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