करोड़ों रुपये बहे पानी में फिर भी बाढ़ का खतरा

Ballia Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
बलिया। दशकों से द्वाबा में गंगा व घाघरा नदियों से हो रहे कटान में सरकार के अरबों खर्च के बावजूद कमी नहीं दिख रही है। हर साल सरकार गांव व बंधों को बचाने के नाम पर करोड़ों रुपये बाढ़ की पानी में बहा रही है। लेकिन गंगा और घाघरा की लहरें हर बचाव विधि को खुद में समा रही हैं।
1959 के पूर्व घाघरा में जल दबाव बढ़ने पर पूरे क्षेत्र में बाढ़ का आना आम समस्या थी। बाढ़ से हर वर्ष जहां करोड़ों का नुकसान होता था, वहीं लाखों लोगों को हफ्तों पानी में गुजरकर समस्याएं झेलनी पड़ती थी। 1959 में तूर्तीपार-श्रीनगर (टीएस बंधा) का निर्माण तत्कालीन सिंचाई मंत्री कमलापति त्रिपाठी के कार्यकाल में हुआ। तब घाघरा वर्तमान बहाव स्थल से करीब साढ़े पांच किमी उत्तर गयासपुर-सिसवन घाट के पास बहा करती थी। धीरे-धीरे दियरा भागड़ के पूरब से नदी दक्षिणमुखी होने लगी। नतीजा रहा कि नदी के कटानी तेवर ने बीते चार दशकों में जहां डेढ़ दर्जन गांव नदी की पेटे में समा गए वहीं नदी की इस विध्वंसक यात्रा में हजारों एकड़ भूमि, सैकड़ों बाग, कई देवालय तथा दर्जनों सरकारी इमारतें नदी की भेंट चढ़ गईं। इस बीच 1971 में चांदपुर के पास नदी ने टीएस बंधे को तोड़ दिया। 1990 में भोज छपरा के पास पुन: एकबार टीएस बंधा टूटा। 2008 में 69.300 से 70 किमी के बीच नदी ने पुन: टीएस बंधे को तोड़ दिया। इसबार बाढ़ विभाग के अधिकारियों की तत्परता के कारण बंधे के बगल में जेसीबी मशीनों से मिट्टी डालकर सात सौ मीटर का सपोर्टिंग बंधा तैयार करने में कामयाबी प्राप्त कर ली गई। इसके चलते क्षेत्र को बाढ़ का मुंह नहीं देखना पड़ा। पुन: 2011 में 70 किमी के पास घाघरा ने बंधे का आधा हिस्सा अपने पेटे में समेट लिया। तब पूरे क्षेत्र में कोहराम मच गया था। 2008 से लेकर तीलापुर के ईर्द-गिर्द टीएस बंधे को निशाने पर लेने की ताक में घाघरा पड़ी हुई है। वर्तमान बरसाती सत्र बाढ़ तथा सिंचाई विभाग के लिए इसलिए चुनौतीपूर्ण है कि अब तक किसी प्रकार का बचाव कार्य बंधे पर नहीं किया जा सकता है। जबकि 70 किमी के पास बंधा अत्यंत जर्जर स्थिति में है। तीलापुर गांव इस स्थान पर नदी के कटानी मुहाने पर है। यदि बंधा टूटा तो नदी सीधे दक्षिण की तरफ घूम जाएगी तथा तीलापुर, झरकटहां, बघमरिया आदि गांवों में जहां कहर बरस सकता है वहीं रेवती सहित दर्जनों गांव बाढ़ की चपेट में आ सकता है। लगभग यही स्थिति गंगा किनारे बसे गांवों की है। यहां सरकार के लाख प्रयास के बावजूद कटान रुकने का नाम नहीं ले रहा है। करोड़ों रपुये खर्च करने के बाद एनएच-31 का खतरा कम नहीं हो रहा है।

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