जीवन जीने की कला है रामचरित मानस

Ballia Updated Mon, 28 May 2012 12:00 PM IST
चितबड़ागांव। यज्ञ में मुख्यत: तीन कार्य होते हैं, देवताओं का पूजन, सत्संग एवं दान। देवताओं के पूजन से धन-धान्य की पुष्टि, सत्संग से आत्म शुद्धि व दान से धन की शुद्धि होती है। रामचरित मानस की कथा त्रेता युग का आख्यान मात्र नहीं है वरन मानव जीवन जीने की कला व जीवन की आदर्श आचार संहिता है।
यह बात क्षेत्र के ब्रह्मी बाबा धाम में आयोजित महारूद्र यज्ञ के दूसरे दिन कथा प्रवचन के दौरान मानस मर्मज्ञ आचार्य अमरनाथ त्रिपाठी ने व्यक्त किया। 25 मई से चल रहे इस यज्ञ में उपस्थित जन समुदाय को रामचरित मानस की कथाओं का रसपान कराते हुए त्रिपाठी ने कहा कि धर्म विरुद्ध आचरण करने वाला व्यक्ति धनी हो सकता है, सुखी नहीं। क्योंकि धर्म विरुद्ध आचरण से चरित्र नहीं रह पाता। उन्होंने श्रीमद्भागवत को उद्धृत करते हुए कहा कि माता-पिता की सेवा एवं सम्मान के द्वारा चारों पदार्थों को सहजता से प्राप्त किया जा सकता है। ब्रह्म, माया एवं जीव का संबंध एवं संदर्भ अलग-अलग है। माया के पीछे चलता हुआ जीव यदि ब्रह्म को भी दिखता रहे तो यही चलना है। संस्कार से चरित्र और चरित्र से स्वस्थ समाज की संरचना हो सकती है। संरक्षक पगला बाबा ने यज्ञ की प्रासंगिकता पर विश्लेषण किया।

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