द्वाबा में दुधारू पशुओं का टोटा

Ballia Updated Thu, 24 May 2012 12:00 PM IST
सुरेमनपुर। द्वाबा क्षेत्र से अच्छी नस्ल वाली दुधारू गाय और भैंस पश्चिम बंगाल और बिहार के खटालों में चली जा रही है। जिससे प्रतिवर्ष गाय और भैंस की संख्या में गिरावट आ रही है। पशुपालन विभाग वर्ष 2003 में पशुओं की हुई गणना के बाद वर्ष 2007 की गणना में 10 फीसदी गिरावट दर्ज की गई है। यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में अच्छी नस्ल की गाय और भैंस द्वाबा में ढूंढने से भी नहीं मिलेंगी।
सरकार ने 1991 में श्वेत क्रांति लाकर दूध उत्पादन को बढ़ावा दिया था। इस योजना के तहत विभिन्न प्रकार की अच्छी नस्ल की गायों को पालने के लिए भी बढ़ावा दिया गया। जिससे द्वाबा में ही नहीं बल्कि प्रदेश में भी दूध के उत्पादन में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई। लेकिन महंगाई की मार झेल रहे और शासन का सहयोग न पाकर पशुपालक महंगे पशुओं को पालने से मुंह मोड़ रहे हैं। पशुपालन विभाग के सर्वे के अनुसार 2007 में 18वीं बार पशुओं की गणना की गई। जिसमें बैरिया तहसील क्षेत्र में गायों की संख्या-29333 भैंस की संख्या-25671, भेड़-2116, बकरी-20563 हैं। वर्ष 2003 के मुकाबले दुधारू पशुओं में 10 फीसदी की कमी आई है। मई 2012 में व्यक्तिगत तौर पर गणना में 26400 गाय और 23104 भैंसों की पुष्टि हुई। इससे वर्ष 2007 के सरकारी पशु गणना के अनुपात में एक बार फिर दुधारू गाय और भैंस की संख्या में 10 फीसदी की कमी दर्ज की गई। बानगी के तौर पर करमानपुर निवासी पूर्व प्रधान पप्पू मौर्य और मंटू सिंह कभी अच्छी नस्ल की गायों को पालकर दूध का उत्पादन करते थे। लेकिन आज उनके दरवाजे पर एक भी गाय नहीं है। उन्होंने बताया कि इस महंगाई के दौर में भूसा पांच रुपये किलो, चोकर 12.50 रुपये किलो, पशुपराग 11 रुपये किलो हो गया है। इस महंगाई में पशुओं को पालना काफी कठिन व घाटे का सौदा है। यही नहीं कई पशुपालक कहते हैं कि आज भी गाय की कीमत कम से कम 35 से 40 हजार रुपया है। शासन-प्रशासन एक दशक पहले तक लोन देकर गाय व भैंस खरीदवा दिया करते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। ऐसे में गाय व भैंस पालने में पशुपालक रुचि नहीं दिखा रहे हैं। प्रतिवर्ष 10 फीसदी अच्छी नस्ल की गाय व भैंस को बंगाल और बिहार के खटाल मालिक महंगे कीमत पर खरीद ले रहे हैं। पशुपालकों की माने तो शासन प्रशासन यदि गाय और भैंस को खरीदवाने में मदद करते और महंगाई पर अंकुश लगाते तो गाय और भैंसों की संख्या नहीं घटती और न कभी दूध की किल्लत होती। इस संबंध में राजकीय पशु चिकित्साधिकारी करमापुर के डा. उमेश प्रसाद ने कहा कि शाहीवाल और फीजियन बछड़ा व मुर्रा नस्ल पाड़ा को कसाई के हाथों बेच बूचड़खानों में भेज दिया जा रहा है। इस तरह से अच्छी नस्ल द्वाबा से समाप्त हो रही है, जो सीमेन बाहर से आता है उस पर विश्वास नहीं होता कि किस नस्ल का है। जबकि सामुदायिक पशु चिकित्सा केंद्र सोनबरसा के डा. के लाल ने कहा कि प्रतिवर्ष द्वाबा से अच्छी नस्ल वाली गाय व भैंस अन्य राज्य के खटाल मालिक महंगी कीमत देकर खरीद ले जा रहे हैं

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