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पानी की कमी कहीं विलुप्त न कर दे जलीय जीवों को

Ballia Updated Sun, 06 May 2012 12:00 PM IST
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नरहीं। गर्मी के मौसम में तापमान जैसे-जैसे चढ़ता जा रहा है, मोक्षदायिनी गंगा का किनारा दिन प्रतिदिन सिकुड़ता जा रहा है। नदी में पानी कम होने से यह प्रदूषित हो गया है। यही नहीं जगह-जगह बालू के टीले देखने को मिल रहे हैं। दूसरी तरफ टोंस और मगई नदी भी नाले का रूप धारण करती जा रही हैं। नदियों में कम होते पानी के लिए सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो पानी में जीवित रहने वाले जीव असमय ही मौत के मुंह में चले जाएंगे और एक दिन ये विलुप्त हो जाएंगे।
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भगवान भास्कर के तल्ख तेवर से कुओं और हैंडपंपों का जलस्तर का नीचे खिसकने का क्रम जारी है। क्षेत्र की तीन नदियां गंगा, तमसा (टोंस) और मगई में पानी की मात्रा कम ही होती जा रही है। साथ ही इन नदियों का पानी प्रदूषण से भी कराह रहा है। टोंस और मगई की स्थिति तो यह हो चुकी है कि इनमें घुटने तक भी पानी नहीं रह गया है। यह नदियां नालों में परिवर्तित होती जा रही हैं। नदियों के सहारे जीवित रहने वाले वन जीव एवं पक्षी भी ठीक से अपनी प्यास नहीं बुझा पा रहे हैं। क्योंकि पानी कम होने से चिलचिलाती धूप में वह खौलने लगता है और वह पानी पीने के बाद पशु-पक्षी बीमार पड़ जाते हैं। यही हाल जिले की प्रमुख नदी गंगा का भी है। नदी में पानी कम होने से किनारा सिकुड़ता जा रहा है। नदी के बीच-बीच में बालू के टीले (रेत) दिखने लगे हैं। आलम यह है कि गंगा को पार करने में जल कम होने से जगह-जगह बड़ी नावें फंस जा रही हैं और उसे किनारे लगाने के लिए मल्लाहों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती रही है।
साथ ही प्रदूषण के चलते पापनाशिनी मां गंगा का जल पीना तो दूर अब लोग आचमन करने लायक भी नहीं रह गया है। बताते चलें कि इन तीनों नदियों से जनपद के हजारों एकड़ खेतों की सिंचाई की जाती है। यदि नदियों में पानी की यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब खेत और बगीचे पानी के अभाव में उजड़ जाएंगे। क्षेत्र के बुजुर्ग पारसनाथ यादव, प्रेम कुमार राय, जनार्दन राय, शिवानंद वर्मा, गिरीजा राय आदि का कहना है कि पतित पावनी गंगा का पानी कभी हम लोगोें के बचपने में निर्मल, अविरल हुआ करता था। लेकिन आधुनिक विकास की होड़ ने केवल गंगा ही नहीं, बल्कि देश की सभी नदियों के पानी को बांध बनाकर तो रोक ही दिया। साथ ही इतना प्रदूषित कर दिया कि अब उसमें नहाना तो दूर उसे पूजा के लिए रखने योग्य भी नहीं रह गया। नदियों में पानी की यदि यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब जमीन पर शुद्ध व पर्याप्त मात्रा में पानी के लिए लोगों को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ेगी।

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