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चुनौतियों को समाप्त करने के लिए बदलनी होगी सोच

Varanasi Bureauवाराणसी ब्यूरो Updated Fri, 07 Dec 2018 11:11 PM IST
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बलिया। समाज में लोगों की सोच और व्यवहार बदले तो महिलाओं के समक्ष आने वाली चुनौतियों पर काफी हद तक विराम लग सकता है क्योंकि सोच से ही किसी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का उत्थान और पतन निश्चित होता है। यह शिक्षा के बगैैर के संभव नहीं है। इसके लिए शिक्षित महिलाओं को आगे समाज में आगे आना होगा। परिवार के लोगों द्वारा भी महिलाओं को सहयोग करना होगा। तभी महिलाएं पग-पग पर आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकेंगी।
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शुक्रवार को अमर उजाला के अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स कार्यक्रम के तहत बेहरी स्थित कार्यालय में वर्तमान परिवेश में महिलाओं की चुनौतियों विषय पर संवाद कार्यक्रम में समाज के अलग-अलग क्षेत्रों से आईं महिलाओं ने खुलकर अपने विचार रखें। सामाजिक कार्यकर्ता भारती सिंह ने कहा कि महिलाओं की चुनौतियां इतनी जल्दी समाप्त नहीं होगी। हालांकि लोगों की सोच बदल रही है। इसके कारण आज महिलाएं आत्मनिर्भर निर्भर बनने के क्षेत्र में कदम आगे बढ़ा रही हैं। इसमें और जागरूकता की आवश्यकता है। शिक्षिका मल्लिका खान ने कहा कि समाज में महिलाओं की रक्षा के लिए बनाए गए कानून में न्याय प्रक्रिया ही काफी हद तक दोषी है, जो कानून तोड़ने वाले को सजा सुनाते-सुनाते वर्षों समय लगा देते हैं। खासतौर से रेप और छेड़खानी के मामले में अपराधी को त्वरित सार्वजनिक तौर पर कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए। इसके लिए महिलाओं और पुरुषों सोच बदलने की आवश्यकता है। शिक्षिका संजना तिवारी ने कहा कि महिलाओं को चुनौतियों से निबटने के लिए बच्चों में बचपन से संस्कार की आदत माता-पिता को डालनी चाहिए। इसके अलावा सहीं और गलत का एहसास कराते हुए खुलकर बात करना चाहिए ताकि उसके अंदर सही और गलत का ज्ञान हो सकें। महिला उद्यमी पूनम सिंह ने कहा कि मुझे आगे बढ़ाने में मेरे परिवार और ज्येष्ठ का काफी सहयोग रहा है। जब महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी तो चुनौतियां धीरे-धीरे स्वयं समाप्त होने लगेगी। शिक्षिका अफसाना ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए नगर ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी सरकार द्वारा आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षण देना चाहिए ताकि वे मुश्किल की घड़ी में अपनी रक्षा कर सकें। शिक्षिका रुकसार का कहना था कि किसी भी धर्म में यह नहीं लिखा है कि महिलाएं घर से बाहर नहीं निकलेंगी, जो इस प्रकार की बातें कहते हैं, वे किसी भी धर्म के ग्रंथों का अध्ययन नहीं करते है। लोगों को उनकी बातों का अमल करने से पूर्व ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। शिक्षिका उषा पांडेय ने कहा कि महिलाओं के चुनौतियों का सामना शिक्षा रूपी हथियार से ही किया जा सकता है। शिक्षिका रश्मि पाठक ने कहा कि महिलाओं पर घरेलू कार्य के साथ-साथ परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी थोप दी जाती है। इसके कारण महिलाओं को करियर बनाने का समय नहीं मिल पाता है। इस सोच को बदलने की जरूरत है। प्रधानाचार्य आभा पांडेय ने कहा कि महिलाएं घरों से निकलकर केवल साक्षर बनने के लिए पढ़ाई न करें, बल्कि शिक्षित बनकर परिवार और समाज को नई रोशनी दें। गृहणी रिंकू यादव ने कहा कि घरेलू महिलाओं की प्रतिभाएं घर में दबकर रह जाती हैं। हुनर होने के बावजूद भी परिवार का सहयोग नहीं मिलता हैं तो महिलाएं कुंठा से ग्रसित हो जाती हैं। समाजसेवी पूनम पांडेय का कहना है कि महिलाओं को मां-बाप द्वारा भेदभाव करके बचपन से जिम्मेदारी दी जाती है। इससे उनका पीछा जीवन भर नहीं छूटता है लेकिन बिना भेदभाव के समान शिक्षा और समान जिम्मेदारी बच्चों के अंदर देने की आवश्यकता है।

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