राजाओं के सपने 63 साल बाद भी अधूरे

Bahraich Updated Sat, 25 Jan 2014 05:46 AM IST
बहराइच। अच्छा भला रजवाड़ा था। दास-दासियां थीं जो एक आदेश पर कुछ भी करने को तैयार हो जाते थे। गणतंत्र में शामिल होकर इनको कुर्बान कर दिया। सोचा था कि सपनों के भारत का निर्माण होगा, पर सपना अभी भी सपना ही है। राजशाही चली गई लेकिन विकास का जो सपना दिखाया गया था वो आज भी पूरा नहीं हो पाया है। प्रमुख रजवाड़ों के वंशज आजादी के इतने साल बाद अपना दर्द इन्हीं शब्दों के साथ बयां करते हैं। रजवाड़ों के वंशजों के अनुसार उनके पुरखे बताया करते थे कि राजशाही खत्म होेने के समय उन्हें आशा थी कि एक बेहतर भारत का निर्माण होगा। गणतंत्र को शक्ल मिले 63 साल से ज्यादा समय बीत चुका है पर अभी तक उनके पुरखों द्वारा संजोए गए भारत का निर्माण नहीं हो सका।
आजाद भारत से पहले जिले में भिनगा, बौंडी, चहलारी, रेहुवा व चरदा पांच स्वतंत्र रियासतें थी। आजादी मिलने के बाद जिले की सभी रियासतों ने भारत गणराज्य में एक-एक कर शामिल होने का निर्णय लिया। राजपाट व शानो-शौकत को छोड़कर इन रजवाड़ों के राजाओं ने देश को एकसूत्र में बांधने का काम किया। इसके बाद देश व समाज सेवा के नाम पर राजाओं के वंशज राजनीति में सक्रिय हो गए। पयागपुर व रेहुवा राजाओं के वंशजों की आज भी कांग्रेस पार्टी में अच्छी दखल है लेकिन देश के विकास की धीमी गति से सभी निराश हैं।
रेहुवा रियासत
रेहुवा रियासत का करीब 800 साल पुराना इतिहास काफी गौरवान्वित रहा है। इस परिवार ने देश को आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आजादी के समय रुद्र प्रताप सिंह रेहुवा रियासत के राजा थे। इसके बाद विजय प्रताप सिंह उर्फ लाल साहब राजा हुए। दोनों राजाओं की मृत्यु हो चुकी है। राजमाता किरन सिंह अपनी धरोहर को समेटे हुए समाजसेवा में लिप्त हैं। वह कहती हैं आजादी के बाद गणराज्य में शामिल होने से पहले उनके पूर्वजों ने क्षेत्र के समुचित विकास का सपना देखा था लेकिन 63 साल बाद भी वह अधूरा है। राजमाता की तीन बेटियां हैं। शिवानी की जयपुर व देवयानी की झारखंड में शादी हो चुकी है। बड़ी बेटी राजकुमारी देविना सिंह अपनी दादी व पूर्व एमपी बसंत कुंवरि बा से प्रेरित होकर राजनीति में सक्रिय हैं। पूर्व में देवयानी सिंह कांग्रेस पार्टी के टिकट पर महसी विधानसभा से अपना भाग्य अजमा चुकी हैं।
राजमाता किरन सिंह ने आजाद भारत केे बाद तत्कालीन फैजाबाद के कमिश्नर व राजा रुद्र प्रताप नारायन सिंह व राजा विजय प्रताप नारायन सिंह के बीच हुए पत्राचार से जुड़े दस्तावेजों को सहेजकर रखा है। इसके अलावा 30 जून वर्ष 1806 में लिखित अपने पूर्वजों की उत्पत्ति व रेहुवा रियासत के राजाओं के नामों से जुड़े दस्तावेज भी राजमाता के पास सुरक्षित हैं।

पयागपुर रियासत
पयागपुर रियासत के वंशज जयेंद्र विक्रम सिंह कहते हैं कि उनके पर बाबा वीरेंद्र विक्रम सिंह आजादी के समय राजा थे। इस रियासत में पयागपुर, इकौना, विशेश्वरगंज, चिलवरिया, हुजूरपुर, फखरपुर क्षेत्र शामिल था। आजादी के बाद उन्होंने पयागपुर रियासत गणराज्य में विलय कर दिया था। उन्होंने बताया कि वर्ष 1728 में जनवार क्षत्रिय प्रथम राजा प्रयास शाह ने पयागपुर की स्थापना कराई थी, जो कालांतर में प्रयागपुर से पयागपुर हो गया। वर्ष 1795 में राजा हिम्मत सिंह ने कोट बाजार की स्थापना की। वर्ष 1884 में राजा भूपेंद्र सिंह ने व्यापार व आवागमन की सुविधा के लिए रेलवे स्टेशन और भूपगंज बाजार की स्थापना की। उनका कहना है कि आजादी के बाद राजा वीरेंद्र विक्रम सिंह ने क्षेत्र के समुचित विकास के लिए रियासत का विलय किया था लेकिन जिस गति से क्षेत्र का विकास होना चाहिए था, वह अवरुद्ध हो गया। आज भी क्षेत्र की जनता तहसील का दर्जा पाने के लिए संघर्षरत है। मंडी समिति की स्थापना नहीं हुई। उद्योग धंधे ध्वस्त हो चुके हैं।

नानपारा रियासत
जिले की बड़ी रियासतों में नानपारा स्टेट भी थी। फिलहाल, इसके राजा शरीफ व राजकुमारी आमना ने महल व अन्य संपत्तियों को बेचकर लखनऊ में मकान बनाया है। हाजी कुर्बान अली व उनके तीन बेटे महल, बाग, स्कूल की देखरेख कर रहे हैं। राजा शरीफ कहते हैं कि देश में प्रजातंत्र है लेकिन देशवासी आज भी गुलामों की तरह जी रहे हैं। भारत गणराज्य में शामिल होने से पहले इसी शर्त पर रियासतों का विलय हुआ था कि देश के हर वर्ग व क्षेत्र का समुचित विकास होगा। सबके हितों का ख्याल रखा जाएगा लेकिन आजादी के 66 वर्ष बात भी लोगों की स्थिति जस की तस है। इसमें आमूल-चूल सकारात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है।

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