काले हिरनों के अनुकूल नहीं कतर्निया!

Bahraich Updated Tue, 18 Sep 2012 12:00 PM IST
बिछिया (बहराइच)। कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में वर्ष 2000 में दो काले हिरन थे। लेकिन वह कहां लुप्त हो गए। पता नहीं चला। पखवारे भर पूर्व बरेली से लाकर दो काले हिरन फिर संरक्षित वन क्षेत्र में छोड़े गए थे जिससे लगा था कि कतर्नियाघाट में अब काले हिरन की प्रजाति भी धमाचौकड़ी करेगी लेकिन माह भर के अंदर ही एक हिरन की मौत से यह सवाल उठने लगा है कि कहीं कतर्निया की आबोहवा काले हिरनों के प्रतिकूल तो नहीं है।
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र नेपाल सीमा से सटा हुआ है। इस जंगल में बाघ और तेंदुओं के साथ हिरनों की कई प्रजातियां धमाचौकड़ी करती हैं। इनमें पाढ़ा, बारहसिंघा, सांभर शामिल हैं। वर्ष 2000 की शाकाहारी वन्यजीव गणना में कतर्निया के जंगल में दो काले हिरन होने की पुष्टि हुई थी। लेकिन उसके बाद वर्ष 2002, 2005 व 2008 में हुई शाकाहारी वन्यजीव गणना के दौरान उन काले हिरनों का पता नहीं लग सका था। जिसके चलते यह मान लिया गया था कि दोनो काले हिरन विलुप्त हो गए हैं। इसी के चलते अगस्त में बरेली वन्यजीव प्रभाग में तस्करों के चंगुल से छुड़ाए गए दो काले हिरनों को मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के आदेश पर कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में छोड़ा गया था लेकिन एक हिरन माह भर भी समय नहीं बिता सका। रविवार को एक हिरन का शव कतर्नियाघाट रेंज में मिला। डॉक्टरों ने हार्ट अटैक से मौत की पुष्टि की है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि कहीं कतर्निया की आबोहवा काले हिरनों के प्रतिकूल तो नहीं है।
क्योंकि 10 वर्ष पहले भी दो हिरन अचानक विलुप्त हुए थे। इस मामले में वन्यजीव विशेषज्ञ व प्रभाग के अधिकारी भी मंथन में जुटे हुए हैं। बचे हुए एक काले हिरन की जिंदगी कैसे सहेजी जाए। इस मामले में प्रभागीय वनाधिकारी आरके सिंह का कहना है कि 90 के दशक में जंगल के अभिलेखों से पता चलता है कि कतर्निया में काफी संख्या में काले हिरन पाए जाते थे। जिसके चलते यह निश्चित है कि जंगल की आबोहवा काले हिरनों के अनुकूल है लेकिन मौत कैसे हुई? इसकी जांच की जा रही है।
गुजरात व राजस्थान में मिलते हैं काले हिरन
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजनाधिकारी दबीर हसन का कहना है कि काले हिरन बहुतायत में गुजरात व राजस्थान में पाए जाते हैं। कतर्निया में 1990 से 2000 के मध्य कुछ काले हिरन देखे गए थे लेकिन उसके बाद उनका पता नहीं चल सका है। उन्होंने कहा कि काले हिरनों को खुला और सूखा क्षेत्र अधिक पसंद होता है। इस समय बरसात का मौसम चल रहा है। हो सकता है नमी के चलते कुछ शारीरिक समस्या उत्पन्न हुई हो।
छोड़ने से पहले नहीं हुआ था स्वास्थ्य परीक्षण
किसी भी वन्यजीव को एक स्थान से लाकर दूसरे स्थान पर छोड़ने के पहले उसका स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है लेकिन बरेली से लाए गए दोनो काले हिरनों का मेडिकल चेकअप नहीं हुआ था। इसकी पुष्टि कतर्नियाघाट रेंज के प्रभारी रेंजर इरफान खान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर पहले ही स्वास्थ्य परीक्षण हो गया होता तो शायद काले हिरन की जिंदगी बच जाती।
कतर्निया में ही रहेगा बचा हुआ हिरन
दुधवा नेशनल पार्क के फील्ड डायरेक्टर शैलेष प्रसाद का कहना है कि काले हिरन को हार्ट अटैक कैसे हुआ, इसकी जांच की जा रही है। अधिकारियों से भी बातचीत की जा रही है। कतर्निया का मौसम हिरनों के पूरी तरह अनुकूल है। यहां पर पहले से ही हिरन की प्रजातियां विचरण करती हैं। पांच हजार से अधिक हिरन हैं। बचा हुआ काला हिरन जंगल में ही रहेगा। उसकी सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।

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