लहरों में डूब गए अरमान दाने-दाने को हैं मोहताज

Bahraich Updated Sun, 26 Aug 2012 12:00 PM IST
बहराइच। बहुत दिनों तक चक्की रोई, चूल्हा रहा उदास। बहुत दिनों तक कानी कुतिया सोयी उनके पास। बहुत दिनों तक छिपकलियों ने खूब लगाई गश्त, बहुत दिनों तक चूल्हे की भी हालत रही शिकस्त। गुलामी की दौर में लिखी गईं ये पंक्तियां तराई में बाढ़ की त्रासदी झेल रहे लोगों पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। इस समय महसी और कैसरगंज के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में कोई तीन दिन से भूखा है तो किसी को दो दिन से पानी नसीब नहीं हुआ। एक तरफ पशुओं का चारा रखा हुआ है तो दूसरी तरफ चूल्हा जल रहा है। अव्यवस्था के बीच लोग दुर्दिन की जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। जबकि जिला प्रशासन सिर्फ दावे करता नजर आ रहा है।
जिले में इस वर्ष दूसरी बार बाढ़ ने दस्तक दी है। महसी और कैसरगंज तहसील के 101 गांव पानी से घिरे हुए हैं। बाढ़ के बीच ही घाघरा की लहरें तेज कटान करते हुए लोगों के अरमानों को भी समेट रही हैं। किसी की गृहस्थी डूब रही है तो किसी का खेत और खलिहान नदी में समाहित हो रहा है। लेकिन राहत और बचाव अब तक नाकाफी साबित हुए हैं। महसी तहसील के पूरेहिंदूसिंहपुरवा प्राथमिक विद्यालय के परिसर में बाढ़ पीड़ित प्लास्टिक का टेंट लगाकर जिंदगी से संघर्ष कर रहे हैं। बांसगढी निवासी रमेश अपनी पत्नी धीरजा व छह बच्चों के साथ टेंट में रह रहे हैं। इस टेंट में ईंटों को जोड़कर चूल्हा बनाया गया है। दूसरी ओर मवेशियों का चारा रखा गया है। धीरजा ने बताया कि तीन दिन बाद वह गृहस्थी समेटकर यहां पहुंचे हैं। अनाज मकान के साथ ही नदी में समाहित हो गया। स्कूल के निकट स्थित रामसुमिरन के घर से तीन किलो चावल उधार लेकर पकाया है, जिससे बच्चे अपनी भूख मिटा रहे हैं। नदी की कटान में रमेश का खपरैला मकान तो समाहित हुआ ही है, 27 बीघा खेत भी खत्म हो गया है। अब मेहनत मजदूरी का ही सहारा है। यह सिर्फ बानगी भर है। ऐसे लगभग 1300 परिवार दुश्वारियों से जूझ रहे हैं। कोई तटबंध पर तो कोई पेड़ और नहर की पटरियों पर शरण लिए हुए हैं।

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