खूनी- बलात्कारी पुलिस पर भारी

Baghpat Updated Fri, 28 Dec 2012 05:30 AM IST
अपराध 2012 2011

हत्या 78 62
बलात्कार 14 08
लूट 38 41
डकैती 02 01
चोरी 42 55
अपहरण 71 74
वाहन चोरी 101 106

नोट : 2012 के आंकड़े 15 दिसंबर तक के हैं ।


बागपत।
आसमान छूते अपराध को भी आंकड़ेबाजी से जमीन पर रखने वाली पुलिस हत्यारों और बलात्कारियों को कागजों में भी काबू में नहीं रख पाई। इस साल चोरी और लूट तो जैसे तैसे कम करके दिखा दी गई लेकिन हत्या और बलात्कार के मामले पुलिस रिकार्ड में भी बढ़ गए। पिछले साल जहां 12 महीनों में 62 मर्डर हुई थे, वहीं इस साल 11.5 महीनों में ही 78 हत्या दर्ज हुई। बलात्कार के मामले आठ से बढ़कर 14 पर पहुंच गए।
इन आंकड़ों को अपराध की हकीकत नहीं कहा जा सकता, लेकिन इनसे यह तो पता चल ही जाता है कि कौन सा जुर्म किस रफ्तार से बढ़ रहा है। वर्ष 2012 में 15 दिसंबर तक बलात्कार के सिर्फ 14 ही केस दर्ज किए गए।
यह सच है कि घटनाएं इससे कहीं ज्यादा हुई लेकिन आंकड़ों में भी पिछले साल के मुकाबले छह वारदात ज्यादा हैं। महिलाओं के लिए यह साल बेहद खतरनाक रहा। बलात्कार के अलावा दहेज हत्या के मामले भी बढ़े हैं।
ये 2011 में 15 थे, जबकि इस साल 17 एफआईआर हुई। पुलिस के इस रिकार्ड में कुछ बातें बहुत चौंकाने वाली हैं। डकैती के भी दो मामले दर्ज हुए हैं इस साल जबकि पिछले साल यह सिर्फ एक ही था।
पुलिस के पास गुड वर्क के रूप में सिर्फ यह दावा है कि फिरौती के लिए एक भी अपहरण नहीं हुआ इस साल जबकि पिछले साल एक हुआ था। बहला फुसलाकर लड़कियों को ले जाने और हत्या के लिए अपहरण के कुल मामले 71 हैं, जो पिछले साल 74 थे।

अपराध में नंबर वन रहा बड़ौत
बागपत। अक्तूबर तक के थानावार आंकडे़ बताते हैं कि जनपद के दस थानों में सबसे ज्यादा क्राइम बड़ौत में हुआ। कुल दर्ज अपराधिक मामलों में बड़ौत में 307, बागपत में 298, खेकड़ा में 104, सिंघावली अहीर में 81, छपरौली में 78, बिनौली में 68, रमाला में 63, चांदीनगर में 56, बालैनी में 39 और दोघट में 50 मामले दर्ज हुए।


ये रहे चर्चित मामले
- जनवरी में पूर्व विधायक त्रिपाल धामा की हत्या की गई।
- जनवरी में ही सरूरपुर के प्राचीन जैन मंदिर में डकैती पड़ी।
- सितंबर में अमीनगर सराय में फिजिशियन ने अपने पिता और बहन की हत्या की।
- अगस्त में असारा गांव में चौहरा हत्याकांड अंजाम दिया गया।
- नवंबर में बड़ौत में ब्लॉक प्रमुख के ससुर का मर्डर किया गया।
- दिसंबर में हमीदाबाद में बच्ची की रेप के बाद हत्या की गई।

निगाह जमने से पहले ही ‘आउट’
बागपत। जनपद की पिच पर कप्तान टिककर ‘बल्लेबाजी’ नहीं कर पा रहे हैं। कोई बदमाशों के बाउंसर से तो कोई राजनीति की गुगली में फंसकर जिले से ‘आउट’ हो जा रहा है। यह छोटा से जनपद 15 सालों में 28 एसपी देख चुका है। वहीं 12 माह में चौथे एसपी आने वाले हैं।
राज्यपाल के एडीसी बनकर जा रहे लव कुमार ने 16 अक्तूबर को बागपत एसपी का चार्ज लिया था। उनका कार्यकाल दो महीने 10 दिन का रहा। उनसे पहले 2004 में डीके ठाकुर को तो महज 10 दिन की ही कप्तानी मिली थी। इतने वक्त में कोई अफसर क्या-क्या कर सकता है? अपराध नियंत्रण तो दूर जिले के जुर्म को समझना ही बेहद कठिन है। ऐसे में जब कप्तानों के विदाई समारोह जल्दी-जल्दी होंगे तो अफसर काम करेंगे या कुर्सी बचाएंगे। हालांकि डीएम यहां खूब टिक रहे हैं। अभी सिर्फ 15 जिलाधिकारियों का ही तबादला हुआ है। इस लिहाज से देखें तो डीएम को काम करने के लिए औसतन एक साल और एसपी को इसका आधा यानी छह महीने मिल रहे हैं। यह वजह है कि आईपीएस अधिकारी बागपत एसपी की पोस्टिंग मिलने पर सबसे पहले यह मालूम करते हैं कि यहां ऐसी क्या वजह है जो इतनी जल्दी कप्तानों के ट्रांसफर हो रहे हैं?

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