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नौ साल से इंसाफ के लिए जंग

Baghpat Updated Wed, 26 Dec 2012 05:30 AM IST
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अमीनगर सराय (बागपत)। दिल्ली गैंग रेप केस पर मचे बवाल से सरकार की नींद उड़ी हुई। इससे ऐसे कई परिवारों में भी इंसाफ की उम्मीद जग गई है जो ऐसे ही जख्म लेकर कचहरी के चक्कर काट रहे हैं। ऐसा ही एक परिवार है खिंदोड़ा गांव के किसान जंग बहादुर का। उनकी लाडली बिटिया आरती की नौ साल पहले गैंगरेप के बाद बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उन्होंने प्रण ले रखा है मुजरिमों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने का लेकिन इंसाफ की इस डगर पर साढ़े नौ साल का लंबा सफर तय करने के बाद भी उनकी मंजिल बहुत दूर बनी हुई है।
घटना 15 अगस्त 2003 की है। आरती अमीनगर सराय के आचार्य जय सागर इंटर कॉलेज की छठीं का छात्र थी। वह आजादी का जश्न मनाकर घर लौट रही थी। रास्ते में उसे चार दरिंदों ने गैंगरेप के बाद उसे मौत के घाट उतार दिया।
इस घटना के बाद जनाक्रोश भड़का और पुलिस हरकत में आई। इसके बाद इरशाद, महबूब, इरफान उर्फ काला और सोनू नामजद हुए। इस मामले में पिछले साल इरशाद को बागपत कोर्ट से उम्र कैद की सजा सुनाई । बाकी ने खुद को नाबालिग बताया। इसके चलते उनका मामला अभी जुनायल कोर्ट में चल रहा है। वहीं इरशाद ने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर रखी है। इस पर आरती के पिता जंग बहादुर भी हाईकोर्ट पहुंचे। उनकी मांग है कि इस केस में उम्रकैद की सजा कम है, फांसी होनी चाहिए। बाकी आरोपियों को हाईकोर्ट से जमानत मिली। इसके खिलाफ जंग बहादुर सुप्रीम कोर्ट गए। आरोपियों पर पुलिस ने गैंगस्टर एक्ट लगाया था। इसका केस बागपत कोर्ट में चल रहा है। इस तरह आरती का परिवार यह केस चार अदालतों में लड़ रहा है। दो केस बागपत में है, एक इलाहाबाद हाईकोर्ट में और एक दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में। जब दो कोर्ट में तारीख एक साथ होती हैं, तो एक में पैरवी के लिए जंग बहादुर जाते हैं और दूसरी में उनके 80 साल के पिता चरण सिंह। पूरे परिवार ने अपनी जिंदगी का एक ही मकसद बना लिया है आरती के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ना। अब अगर दिल्ली गैंग रेप केस के मद्देनजर सरकार ऐसे मामलों की त्वरित सुनवाई का कोई कानून बनाती है तो जंग बहादुर जैसे लोगों को बड़ी राहत मिलेगी।

आर्थिक मदद भी नहीं मिली
अमीनगर सराय। जंग बहादुर बताते हैं कि इंसाफ की इस लड़ाई में वे अपना सब कुछ गंवाने को तैयार हैं। चाहें कर्ज भी लेना पड़े लेकिन आखिरी सांस तक संघर्ष करेंगे। उन्होंने बताया कि सरकार ने उन्हें आज तक किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं दी।

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